मुंबई : महाराष्ट्र में मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच के मतभेद को लेकर आज बॉम्बे हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की है। हाईकोर्ट ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि राज्य के दो सर्वोच्च संवैधानिक नेताओं ने एक-दूसरे पर भरोसा नहीं किया।मुख्य न्यायाधीश दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति एमएस कार्णिक की पीठ ने कहा कि दोनों (मुख्यमंत्री और राज्यपाल) के लिए एक साथ बैठना और मतभेदों को सुलझाना उचित होगा। अदालत ने महाराष्ट्र विधानसभा अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए अधिवक्ता महेश जेठमलानी और सुभाष झा के माध्यम से दायर दो जनहित याचिकाओं की अध्यक्षता करते हुए मौखिक टिप्पणियां कीं। हाईकोर्ट ने लंबी सुनवाई के बाद दलीलों को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि प्रक्रिया कानून के समक्ष नागरिकों के समानता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं करती है, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 14 द्वारा गारंटी दी गई है।
दो जनहित याचिकाओं में से एक में भाजपा विधायक गिरीश महाजन का प्रतिनिधित्व करने वाले जेठमलानी ने उच्च न्यायालय को बताया कि वर्तमान प्रक्रिया, जिसे दिसंबर 2021 में एक संशोधन के माध्यम से लाया गया था। जिसमें कहा गया कि विधानसभा अध्यक्ष को चुनने के लिए राज्यपाल अकेले मुख्यमंत्री सलाह नहीं दे सकते बल्कि मंत्रिपरिषद को भी शामिल करना चाहिए। जेठमलानी ने आगे तर्क दिया कि इस मुद्दे में हस्तक्षेप न करने से अदालत जनहित की रक्षा करने में विफल होगी।
हाईकोर्ट ने लगाई फटकार
हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं को यह दिखाने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी कि विधानसभा अध्यक्ष के चुनाव से आम जनता कैसे प्रभावित हो रही है। जनता की दिलचस्पी कम से कम इस बात में है कि विधानसभा का अध्यक्ष कौन होगा। बस जाइए और जनता से पूछिए कि लोकसभा का अध्यक्ष कौन है? इस अदालत में कितने लोग जवाब दे पाएंगे? आपको यह दिखाना होगा कि यह मुद्दा जनहित याचिका के योग्य है या नहीं? अध्यक्ष सिर्फ विधायिका के सदस्य हैं। यहां जनहित क्या है?





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