मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने राइट टू एजुकेशन (आरटीई) कानून के अंतर्गत निजी स्कूलों को छूट देने वाले राज्य सरकार के नए नियम पर अगले आदेश तक अंतरिम रोक लगा दी है। अधिसूचना के अंतर्गत इन नियमों के तहत निजी स्कूलों को आरटीई के 25 प्रतिशत कोटे से छूट दी गई थी। नियमों के अनुसार, यदि निजी स्कूल के एक किमी के दायरे में सरकारी या अनुदानित स्कूल है, तो निजी स्कूल को आरटीई के तहत 25 प्रतिशत सीटें कमजोर तबकों के बच्चों के लिए आरक्षित नहीं रखनी पड़ेंगी। इस नियम को जनहित याचिका के जरिए हाई कोर्ट में चुनौती दी गई है।
सोमवार को चीफ जस्टिस डी के उपाध्याय और जस्टिस आरिफ डॉक्टर की बेंच ने सुनवाई के बाद कहा कि प्रथम दृष्टया नियमों में किया गया बदलाव आरटीई कानून के विपरीत और उसके दायरे के बाहर नजर आ रहा है। यह शिक्षा के अधिकार को प्रभावित करता है।
सरकार से मांगा हलफनामा
इस तरह बेंच ने व्यापक सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए नियमों पर रोक लगा दी। बेंच ने साफ किया कि कानून के प्रावधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि आरटीई का आरक्षण केवल पड़ोस में सरकारी स्कूल न होने की स्थिति में लागू होगा। बेंच ने 12 जून को याचिका पर अगली सुनवाई रखी है और सरकार को हलफनामा दायर करने का निर्देश दिया है।
‘नियम समावेशी शिक्षा के विपरीत’
सीनियर ऐडवोकेट गायत्री सिंह के माध्यम से दायर याचिका में दावा किया गया है कि नए नियम 6 से 14 साल के बच्चों के शिक्षा के अधिकार का उल्लंघन करते हैं। यह नियम आरटीई के तहत समावेशी शिक्षा प्रदान करने के उद्देश्य के विपरीत है। यह नियम हाशिए पर पड़े बच्चों के हितों को प्रभावित करते हैं। मध्यप्रदेश और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने आरटीई कानून में किए गए इस तरह के बदलाव को रद्द कर दिया है, क्योंकि यह संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 21ए, का उल्लंघन करता है। इससे पहले सरकारी वकील ज्योति चव्हाण ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि नए नियम केवल एक किमी के दायरे में स्थित निजी गैर अनुदानित स्कूलों पर लागू होते हैं।





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