मुंबई: लोकसभा चुनाव 2024 में उद्धव ठाकरे की पार्टी ने महाराष्ट्र में करिश्मा कर दिया है। शिवसेना ने महा विकास अघाड़ी गठबंधन के साथ मिलकर लोकसभा की 9 सीटें जीतीं। शिवसेना यूटीबी ने महाराष्ट्र की 21 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ा और उसे 9 पर जीत मिली। हालांकि उद्धव ठाकरे के लिए नतीजे भले ही मिले-जुले रहे हैं लेकिन उन्होंने यह कामयाबी तब हासिल की जब उनके हाथ से सबकुछ चला गया था। दरअसल इन्होंने अपनी पार्टी का आधिकारिक नाम और चुनाव चिन्ह प्रतिद्वंद्वी एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी के हाथों खो दिया। शिंदे ने दो साल पहले जब से शिवसेना के अधिकांश सांसदों और विधायकों को बीजेपी के साथ गठबंधन के लिए तैयार किया था। तब से उद्धव ठाकरे ने ‘मशाल’ या जलती हुई मशाल (उनका चुनाव चिन्ह) के इर्द-गिर्द विश्वासघात की कहानी गढ़ी थी। शिवसेना (यूबीटी) ने शिंदे के नेतृत्व वाली पार्टी से दो सीटें ज़्यादा और 13 में से सात सीटें जीती हैं, जहां उसका मुकाबला बीजेपी से था।
रवींद्र वायकर के चुनाव को चुनौती देंगे
मुंबई में जहां पार्टी की स्थापना हुई थी, शिवसेना (यूबीटी) ने चार में से तीन सीटें जीतीं। लेकिन कोंकण में उसे हार का सामना करना पड़ा, जो उसका एक और गढ़ था। उद्धव ठाकरे ने कहा कि मुझे उम्मीद थी कि हम ज़्यादा सीटें जीतेंगे। मुंबई उत्तर पश्चिम को लेकर हमें कुछ संदेह है। हम रवींद्र वायकर के चुनाव को चुनौती देंगे। हम कोंकण में सीट हार गए हैं। यह आश्चर्य की बात है लेकिन हम देखेंगे कि ऐसा क्यों हुआ। यह परिणाम ठाकरे के लिए मुक्ति का संकेत हैं। इन्होंने कांग्रेस और एनसीपी के साथ साझा कारण बनाने के लिए कट्टर हिंदुत्व के आदर्शों पर आधारित पार्टी का पुनर्गठन किया।
विपक्ष के सीएम चेहरे बनने की स्थिति में हैं उद्धव
एकनाथ शिंदे का आरोप है कि ठाकरे पार्टी के संस्थापक बालासाहेब के मूल मूल्यों से मुकर गए, अभी तक सही साबित नहीं हुआ है। परिणाम इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि शिवसेना (यूबीटी) ने बीजेपी के साथ संबंध तोड़ने के बावजूद अपनी पकड़ बनाए रखी। इसे लोकसभा अभियानों में प्रमुख भागीदार के रूप में देखा गया था। ठाकरे अब अक्टूबर में महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए विपक्ष के सीएम चेहरे बनने की स्थिति में हैं।
मुस्लिम-दलित वोटरों को जोड़ने में कामयाब रहे
एक पर्यवेक्षक ने कहा कि शिवसेना के मूल मराठी मतदाता ठाकरे के साथ बने हुए हैं और वह मुस्लिम और दलित मतदाताओं को जोड़ने में कामयाब रहे हैं। यह उन्हें विधानसभा चुनावों के लिए सबसे स्वीकार्य चेहरा बनाता है। लोकसभा के परिणाम यह भी दिखाते हैं कि एमवीए सहयोगियों के बीच वोट ट्रांसफर हो सकता है। कृषि संकट और नौकरियों और मूल्य वृद्धि की चिंता के बीच राज्य में मजबूत सत्ता विरोधी लहर के चलते ठाकरे विधानसभा चुनावों के लिए मिशन मोड में होंगे।
किनकी होगी यूटीबी में वापसी
शिवसेना (यूबीटी) के पदाधिकारियों को भी उम्मीद है कि शिंदे गुट के कई कार्यकर्ता और मध्यम स्तर के पदाधिकारी वापस आएंगे। हालांकि ठाकरे ने कहा है कि दलबदलू विधायकों और सांसदों के लिए उनके दरवाजे बंद हैं, लेकिन वे मध्यम स्तर के पदाधिकारियों और जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं को वापस ले सकते हैं। एक पर्यवेक्षक ने कहा कि अगर विधायकों और सांसदों को वापस नहीं लिया जाता है, तो भी उद्धव पूर्व पार्षदों और शाखा स्तर के कार्यकर्ताओं को लुभाने के लिए बहुत अधिक प्रयास कर सकते हैं। अक्टूबर में सेना (यूबीटी) एमवीए के भीतर विधानसभा सीटों के एक बड़े हिस्से पर भी नजर रखेगी।





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