मुंबई : ब्रिटिश ताज और राज की सुरक्षा को प्राथमिकता देने वाले आपराधिक कानूनों (इंडियन पीनल कोड, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड और इंडियन एविडेंस ऐक्ट) की विदाई हो चुकी है। 1 जुलाई से भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था का नया दौर शुरू हो चुका है। यह व्यवस्था न सिर्फ आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल पर जोर देती है, बल्कि जुडिशियल सिस्टम को ‘तारीख पर तारीख’ के तंज से मुक्ति का भरोसा भी देती है। भारतीय न्याय सहिंता, भारतीय नागरिक सुरक्षा सहिंता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, यह तीनों नए कानून न्याय दान से जुड़े सभी घटकों की प्रतिबद्धता तय करते हैं। ये कानून पुलिस स्टेशन में एफआईआर से लेकर न्यायालय के निर्णय तक की पारदर्शिता को सुनिश्चित करते हैं। हालांकि कुल पेंडिंग केसों में से राज्य भर में अभी 32 प्रतिशत आपराधिक मामले ऐसे हैं, जो एक साल पुराने हैं। तीन साल पुराने ऐसे 24 फीसदी मुकदमे हैं। 16 प्रतिशत केस पांच साल पुराने हैं। 6.22 फीसदी केस दस से 20 साल पुराने हैं। ऐसी स्थिति के बावजूद प्रस्तुत है वक्त की बर्बादी और उबाऊ सुनवाई से राहत दिलाने का विश्वास जगाने वाले नए कानून की खासियत को सामने लाने वाली यह रिपोर्ट:
सीनियर ऐडवोकेट अनिल सिंह के मुताबिक, अक्सर यह देखा गया है कि आपराधिक मामलों में आरोपी बेल हासिल करने के बाद मुकदमों की सुनवाई में देरी करते हैं। विलंब से अपराध से जुड़ा आक्रोश कम होता जाता है। फिर अलग-अलग हथकंडों से आरोपी अनुचित लाभ लेते हैं। चूंकि अब मुकदमे की सुनवाई पूरी करने को लेकर समय-सीमा तय कर दी गई है। इसका निश्चित तौर पर सकारात्मक असर पड़ेगा। कई बार लोगों को झूठे केस में फंसा दिया जाता है, ऐसे केस भी लंबे समय तक चलते रहते हैं, जिससे पीड़ित को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।
न्याय के लिए समय सीमा तय किया जाना जजों के माइंडसेट पर असर डालेगा। तमाम चुनौतियों के बावजूद यह न्याय व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव लाएगा। उम्मीद है कि अब पक्षकारों को केस के निपटारे के लिए अंतहीन समय तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
ऐडवोकेट जितेंद्र मिश्रा
उन्होंने कहा कि शिक्षा के प्रसार और तेजी से बदले सामाजिक परिवेश के कारण अब कानूनी तरीके से विवादों के निपटारे का चलन बढ़ा है। इस लिहाज से भी केस के निपटारे के लिए तय की गई समय सीमा लोगों के लिए बड़ी राहत साबित होगी। तेजी से न्याय देने के लक्ष्य को पूरा करने के लिए जरूरी है कि अदालतों को पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध कराया जाए। जुडिसरी के बजट में बढ़ोतरी की जाए। पर्याप्त जजों की नियुक्ति की जाए, जिससे केसों का बैकलॉग खत्म किया जा सके। न्याय का टाइम फ्रेम मुख्य रूप से न्याय होना नहीं, बल्कि होते हुए भी नजर आना चाहिए’ की अवधारणा को साकार करने में काफी कारगर साबित होगा।
अनुशासन तेजी से न्याय में होगा मददगार
ऐडवोकेट नुशरत शाह का कहना है कि नए कानून में मुकदमे के निपटारे की समय सीमा तय करने से न्यायिक कार्यवाही का अनुशासन मजबूत होगा। यह बेवजह सुनवाई टालने की मंशा रखने वालों के लिए हिदायत देता है। यानी सुनवाई टालने के लिए वकीलों को वास्तविक कारणों का खुलासा करना होगा। नए कानून में जिस तरह से तकनीक के साथ तालमेल बिठाया गया है। वह बेहद सराहनीय है। आने वाले समय में यह न्याय व्यवस्था में व्यापक बदलाव का आधार होगा। शुरुआत में छोटे-छोटे केसों को निर्धारित समय में निपटाना आसान होगा। जहां तक बात ट्रायल की है, तो इसकी सुनवाई बहुत से बातों पर निर्भर होती है, लेकिन हमें उम्मीद है कि जज ट्रायल को भी निर्धारित समय में पूरा करेंगे।
नए कानून की खासियत
नए कानून में तीन साल के भीतर सुनवाई को पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
वकीलों को दो से अधिक बार सुनवाई को टालने की मांग करने पर रोक लगाते हैं।
चार्जशीट दायर होने के पहली सुनवाई के बाद 60 दिन के भीतर आरोप तय करने का प्रावधान है।
मामले की सुनवाई पूरी होने के 45 दिन के भीतर फैसला सुनाना होगा।
90 दिन में पुलिस को जांच पूरी करनी होगी
5 हजार रुपये से कम की चोरी के मामले में सजा के रूप कम्युनिटी सर्विस का प्रावधान किया गया है।
गवाहों, आरोपियों और विशेषज्ञों को ऑनलाइन कोर्ट में पेश होने की सहूलियत दी गई है
राज्य और जिला स्तर पर प्रॉसिक्यूशन निदेशालय की स्थापना होगी। यह निदेशालय मुकदमा चलाने की मंजूरी देता है
गवाही और पंचनामे में तकनीक को काफी महत्व दिया गया है।





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