मुंबई : बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक कस्टोडियल डेथ के मामले में पुलिस अधिकारी सिद्दप्पा काशीराय सावली को 30 साल बाद निर्दोष बरी कर दिया। अदालत ने उनके खिलाफ ट्रायल कोर्ट के 2002 के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि प्रथम दृष्टया मुझे कोई कारण नहीं दिखाई देता कि बिना किसी प्रथम दृष्टया समर्थन सामग्री के याचिकाकर्ता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। 1993 में तलोजा पुलिस की हिरासत में चोरी के एक संदिग्ध आरोपी की मौत हो गई थी। इस मामले में पुलिस अधिकारी सावली को जिम्मेदार ठहराया गया था। न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की एकल पीठ के समक्ष पुलिस अधिकारी सिद्दप्पा काशीराय सावली की ओर से वकील निरंजन मुंदरगी और केरल मेहता की दायर याचिका पर सुनवाई हुई। याचिका में ट्रायल कोर्ट के फैसले को रद्द करने और उसे (याचिकाकर्ता) को कस्टोडियल डेथ के मामले में बरी करने का अनुरोध किया गया। पीठ ने याचिकाकर्ता की याचिका को स्वीकार करते हुए अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता की बरी करने की याचिका को खारिज करते हुए कोई कारण नहीं बताए। आपराधिक कानून में कोई प्रतिनिधि दायित्व नहीं है और इसलिए मामले के तथ्यों पर विचार करने की आवश्यकता है। जबकि ट्रायल कोर्ट का यह कर्तव्य था कि वह प्रथम दृष्टया साक्ष्य पर विचार करे और यह पता लगाए कि क्या यह याचिकाकर्ता के खिलाफ अभियोजन पक्ष द्वारा बनाए गए मामले के अनुरूप है। क्या है पूरा मामला याचिकाकर्ता तलोजा पुलिस स्टेशन में पुलिस उप निरीक्षक के पद पर तैनात था। 19 सितंबर 1993 को पनवेल के टोंडारे गांव निवासी भाऊ राम पाटिल ने तलोजा पुलिस स्टेशन में अपने घर में सोने के गहने चोरी की शिकायत दर्ज कराई थी। पुलिस ने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ आईपीसी की धारा 380 और 34 के तहत मामला दर्ज किया था। मामले की जांच पुलिस उप निरीक्षक सिद्दप्पा काशीराय सावली को सौंपी गई थी।





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