मुंबई : भारत की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना में सबसे बड़ी बाधा चीन बना था। आखिरकार अब वह बाधा दूर हो गई है। एक विशाल टनल बोरिंग मशीन (टीबीएम) जो चीन के एक बंदरगाह पर फंसी हुई थी, अब 24 सितंबर को मुंबई पहुंचने की उम्मीद है। अधिकारियों ने पुष्टि की है कि कारखाने में परीक्षण और संयोजन के बाद, अंडरग्राउंड सुरंग बनाने का काम जनवरी 2027 में शुरू होगा। पीएम मोदी और चीन के राष्ट्रपति की मुलाकात के दौरान यह मुद्दा उठा था। बताया जा रहा है कि इस मुद्दा का हल हो गया था और अब उसी का नतीजा है कि मशीन भारत आ रही है।
यह सफलता महीनों की अनिश्चितता के बाद मिली है जिसने 1.08 लाख करोड़ रुपये की मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल परियोजना में देरी को लेकर चिंताएं बढ़ा दी थीं। हालांकि दोनों टीबीएम का ऑर्डर जर्मन टनलिंग कंपनी हेरेनक्नेच से दिया गया था, लेकिन इनका निर्माण चीन के ग्वांगझू स्थित इसके कारखाने में किया गया था और ये इस साल की शुरुआत से ही एक चीनी बंदरगाह पर रुकी हुई थीं। बीजिंग के अधिकारियों ने मंजूरी रोकने का कोई आधिकारिक कारण नहीं बताया।
मोदी और शी जिनपिंग की मुलाकात में हुई थी चर्चा!
इस गतिरोध के चलते रेल मंत्रालय ने इस मामले को विदेश मंत्रालय तक पहुंचाया, जिसने राजनयिक माध्यमों से इस खेप की रिहाई सुनिश्चित करने के लिए बातचीत की। सूत्रों ने बताया कि तियानजिन में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के दौरान भी यह मुद्दा उठाया गया था। भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने विशेष रूप से टीबीएम खेप को परियोजना के लिए एक प्रमुख बाधा बताया और इसे मंजूरी देने के लिए बीजिंग से सहयोग मांगा। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पुष्टि की कि टीबीएम चीन से भेज दी गई हैं।
25 तक आ जाएगी मशीन
सूत्रों ने बताया कि पहली टीबीएम 24 या 25 सितंबर को जेएनपीटी बंदरगाह पर पहुंच जाएगी और दूसरी भी कुछ हफ़्तों में पहुंचने की उम्मीद है। टीबीएम जनवरी 2027 में इस स्थल पर चालू हो जाएगी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि यह परियोजना के लिए सबसे गंभीर विदेशी बाधा थी। अब जब मशीन पहुंच गई है, तो भूमिगत पैकेज अपने कार्यान्वयन चरण में प्रवेश कर सकता है।
गलवान घाटी झड़प के बाद बना मुद्दा
2020 में गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई झड़प के बाद से, भारत ने चीनी निवेश और खेपों पर कड़ी निगरानी रखी है। इसके कारण अनुबंधों में देरी और रद्दीकरण हुआ। इसमें एमएमआरडीए के मुंबई मोनोरेल के लिए चीनी बोलियों को रद्द करना और महाराष्ट्र द्वारा चीनी कंपनियों के साथ 5,000 करोड़ रुपये से अधिक के समझौता ज्ञापनों को निलंबित करना शामिल है।





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