नई दिल्ली : फ्रांस में इस्लामिक कट्टरपंथ की वजह से इस समय भय का माहौल है। पैगंबर मोहम्मद साहब का कार्टून दिखाने पर एक टीचर की सरेआम हत्या के बाद लोगों में गुस्सा है। कई जगह मस्जिदों को बंद कर दिया गया है। फ्रांस के अलावा यूरोप में भी जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं। फ्रांसीसी सरकार भी देश से इस्लामी कट्टरपंथ को मिटाने के लिए ऐक्शन में है। बड़ी संख्या में संदिग्ध लोगों को हिरासत में भी लिया गया है। वहां धार्मिक आजादी को लेकर एक बहस छिड़ गई है। फ्रांस में इस्लामिक कट्टरपंथ के खिलाफ यह माहौल किस तरह बना और वहां के नागरिकों में डर घर क्यों कर रहा है, जानने के लिए पढ़िए ऐसे घटनाक्रम पर पैनी नजर रखने वाले वेद प्रताप वैदिक का लेख।
इस्लाम के नाम पर फ्रांस में कितना वीभत्स कांड हुआ है, उसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। एक छात्र ने अपने अध्यापक का गला रेतकर उसकी हत्या कर दी। हत्यारे का नाम अब्दुल्ला अजारोव है और उस अध्यापक का नाम सैमुअल पेटी था। अब्दुल्ला की उम्र 18 साल है और उसके माता-पिता चेचन्या के मुसलमान हैं। चेचन्या रूस का वह इलाका है, जहां के उग्रवादियों का मुकाबला करने के लिए कुछ साल पहले रूसी सरकार ने थोक बम-वर्षा की थी। अब्दुल्ला ने सैमुअल पेटी की हत्या इसलिए कर दी कि उसने अपने छात्रों को अभिव्यक्ति की आजादी के बारे में पढ़ाते हुए पैगंबर मोहम्मद के कुछ कार्टून दिखा दिए थे। उस अध्यापक के विरुद्ध हत्यारे के पिता तथा कई मुल्ला-मौलवियों ने इंटरनेट पर निरंकुश अभियान छेड़ रखा था।
सैमुअल पेटी की हत्या से पूरे यूरोप में रोष की लहर फैल गई है। फ्रांसीसी सरकार ने अब्दुल्ला के साथ-साथ दर्जनों ऐसे मुसलमानों को गिरफ्तार कर लिया है, जिनके बयानों, इशारों और साजिशों के कारण यह हत्याकांड हुआ है। पेरिस के उत्तर-पश्चिम में बनी मस्जिद पर अगले छह महीने के लिए ताले ठोक दिए गए हैं। फ्रांस के गृहमंत्री ने कहा है कि हमारे ‘गणराज्य के दुश्मनों को हम एक मिनट भी चैन से नहीं बैठने देंगे।’ ‘शहीद अध्यापक’ के लिए फ्रांसीसी सरकार ने अपने सर्वोच्च सम्मान की घोषणा की है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कुछ दिन पहले ही कहा था कि वे ‘इस्लामी अलगाववाद’ के खिलाफ जोरदार अभियान चलाएंगे।
जब से अफ्रीका और एशिया के देश आजाद हुए हैं, उनके हजारों मुसलमान नागरिक काम की तलाश में यूरोप में आ बसे हैं। यूरोपीय लोगों ने इन लोगों को इसलिए भी अपने यहां बसने दिया था कि ये लोग मेहनत-मजदूरी के काम करते हैं और सस्ते में उपलब्ध हो जाते हैं। फ्रांस में गैर-फ्रांसीसी मुसलमानों की संख्या 50 से 60 लाख तक है। ये कुल जनसंख्या के लगभग 9-10 प्रतिशत हैं। फ्रांसीसी सरकार ने इन पर काफी खोज-बीन करके आंकड़े जमा कर रखे हैं। इन अफ्रीकी, तुर्की और मध्य एशियाई मूल के नागरिकों ने प्रायः फ्रांसीसी भाषा और संस्कृति से काफी ताल-मेल बिठा लिया है लेकिन अभी 40-50 प्रतिशत मुसलमान ऐसे हैं, जो दिन में पांच बार नमाज पढ़ने, रोजा रखने, पर्दा करने और तालीम के लिए मदरसे जाने में विश्वास करते हैं। इस समय फ्रांस में 2300 मस्जिदें सक्रिय हैं और लगभग एक लाख फ्रांसीसियों को ईसाई से मुसलमान बनाया गया है।
फ्रांसीसी सरकार को सबसे बड़ी चिंता इस बात की है कि युवा मुसलमानों में अब कई आतंकवादी होते जा रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक 75 प्रतिशत युवा उग्रवाद में विश्वास करने लगे हैं। कुछ अरब देशों की मदद से ये युवक सारे यूरोप में आतंक का बड़ा जाल बिछा रहे हैं। पैगंबर के कार्टूनों को लेकर 2005-06 में डेनमार्क के एक प्रसिद्ध अखबार के खिलाफ इतना भयंकर अभियान चला कि इस्लामी देशों और यूरोप में लगभग ढाई सौ लोग मारे गए थे। 2015 में इन्हीं कार्टूनों को लेकर फ्रांस की प्रसिद्ध व्यंग्य-पत्रिका ‘चार्ली हेब्दो’ के 12 पत्रकारों की हत्या कर दी गई थी। इस पत्रिका में इस्लाम ही नहीं, ईसाई और यहूदी मजहबों के विरुद्ध भी कार्टून और लेख छपते थे।
धार्मिक उग्रवाद के विरुद्ध अब से 15-20 साल पहले ही फ्रांसीसी सरकारों ने कार्रवाई शुरू कर दी थी। राष्ट्रपति जाक शिराक ने घोषणा की थी कि फ्रांस ‘लायसिती’ की नीति पर चलता है याने कोई भी मजहबी कानून राष्ट्रीय कानून से ऊपर नहीं हो सकता है। फ्रांसीसी क्रांति से उपजे इस सिद्धांत पर 1905 में मुहर लगी, जब चर्च की दादागीरी के खिलाफ फ्रांसीसी संसद ने कमर कस ली थी। जाक शिराक के जमाने में सरकारी स्कूलों में किसी छात्र या छात्रा को ईसाइयों का क्रॉस या यहूदियों का यामुका (टोपी) या मुसलमानों का हिजाब पहनकर आने की अनुमति नहीं थी। मजहबी छुट्टियों की मनाही थी। ईद और योम किप्पूर के दिन भी छुट्टियां नहीं होती थीं। यूरोप के लोगों में सहिष्णुता का वह भाव नहीं है, जो भारत-जैसे देशों में है। वहां के ईसाई उग्रवादी संगठनों ने कई मस्जिदें गिरा दी हैं, वे धर्म-परिवर्तन के सख्त विरोधी हैं। वे मुसलमानों को रोजगार देने का भी विरोध करते हैं। वे सारे मदरसों को बंद करने की मांग करते हैं। उन्होंने भी यूरोप के कई देशों में अपना जाल बिछा लिया है। वहां ईसाई उग्रवाद और इस्लामी उग्रवाद में सीधी टक्कर शुरू हो गई है।
जहां तक यूरोप के आम लोगों की बात है तो मजहब के मामले में वे बिल्कुल आजाद रहना चाहते हैं। अपनी अभिव्यक्ति की आजादी को वे किसी मजहब से ज्यादा पवित्र मानते हैं। वे इस्लाम, कुरान और पैगंबर मोहम्मद की भी वैसी ही आलोचना करना अपना अधिकार समझते हैं, जैसे कि वे माता मरियम, ईसा मसीह या मूसा की करते हैं। अपने छात्र-काल में मैंने कर्नल इंगरसोल की ऐसी किताबें ईसाइयत के बारे में पढ़ी हैं। वे खुद पादरी के बेटे थे लेकिन उन्होंने ईसाइयत के परखचे उड़ा दिए थे। बाद में उनकी और उनके कई अनुयायियों की भी हत्या कर दी गई थी, हालांकि उनका उद्देश्य ईसा मसीह या पैगंबर साहब की निंदा करना नहीं था।
दुनिया अब काफी बदल चुकी है। यूरोपीय लोग यदि यह ध्यान रखें कि जिन बातों को आप पसंद नहीं करते, उन्हें आप न करें लेकिन उनके लिए दूसरों का दिल दुखाना या अपमान करना उचित नहीं है तो बहुत-सी समस्याओं का हल अपने आप निकल सकता है। दुनिया के मुसलमानों को भी सोचना चाहिए कि क्या इस्लाम इतना छुई-मुई पौधा है कि किसी का फोटो छाप देने या उस पर व्यंग्य कस देने से वह मुरझा जाएगा? अरब जगत की जहालत (अज्ञान) दूर करने में इस्लाम की जो क्रांतिकारी भूमिका रही है, उसे देश-काल के मुताबिक ढालकर अपने साथ-साथ दूसरों का भी भला करना इस्लाम का लक्ष्य क्यों नहीं होना चाहिए?





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