Home Country अतीत की काली परछाइयों से मुक्ति की उजली सुबह तक

अतीत की काली परछाइयों से मुक्ति की उजली सुबह तक

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मुरादाबाद : कुछ जातियों को अपराधील घोषित करके उन पर प्रतिबंध लगाने का नियम 30 वर्ष पहले कार्यान्वित किया गया था। स्वतंत्रता के इस युग में यह अनुचित है कि किसी व्यक्ति विशेष को जन्म में ही अपराधों घोषित करके उसे नागरिकता के साधारण अधिकारों से बचित कर दिया जाए। अतः भारत में गणतंत्रीय सासन ने यह निर्णय लिया है कि 31 अगस्त 1952 से अपराधील जातिय अधिनियम का अंत कर दिया जाए।
उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन शिक्षा मंत्री हर गोविंद सिंह ने 1952 में जब यह आदेश जारी किया तो मुख्यतः मुरादाबाद और इसके निकटवर्ती इलाकों में रहने वाली भांतू जनजाति के लिए एक ऐसी सुबह का सूरज उगा जिसमें उम्मीद का उजाला था। अपने काले अतीत से पीछा छुड़ाने और समाज की मुख्य धारा में शामिल होने का संकल्प था। सोनकपुर ओवरब्रिज के पासे कई किलोमीटर के दायरे में बसी आदर्श कॉलोनी आज इसी संकल्प का मूर्तरूप नजर आती है। ओज यह नोनी भी शहर की दूम्री तमाम बस्तियों की तरह एक सामान्य रिहायशी भातुओं का यहां तक पहुंचने का सफर आसान नहीं रहा। उनकी इस यात्रा में विटंबना है। विद्रोह है। आपराधिक इतिहास की काली छाया है। और है, शिक्षा के माध्यम से गढ़ी गई एक नई दुनिया।
भांतूओं के शुरुआती अतीत को वैसे तो कोई ठोस दस्तावेशी जानकारी नहीं मिलती, लेकिन 1914 में प्रकाशित यूनाइटेड प्रोविंस के पुलिस अधीक्षक एमटी हॉलिस की किताब द क्रिमिनल ट्राइब यूनाइटेड प्रोविंस में यह संभावना जाहिर की गई है कि संभवत भालू शब्द की उत्पति भाट से हुई है। हॉलिंस ने कर्ज और जातियों को भी चिहिनत किया और इन्हें आपराधिक प्रवृत्ति का बताते हुए इन पर नियंत्रण के लिए एक रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंपी।
नतीजा यह हुआ कि अंग्रेज सरकार ने भांतु और ऐसी तमाम जातियों पर नियंत्रण के लिए तत्कालीन गुनाइटेड प्रोविंस के कानपुर इलाहाबाद, लखनऊ, गोरखपुर और मुरादाबाद इत्यादि कई जिलों में शहर के बाहर अलग बाहे बना दिए। इन्हें सेटेलमेट कहा जाने लगा। यहां रहने वालों पर सख्त निगरानी रखी जाती थी और जब यह बस्ती से बाहर जाते ही उन्हें इसकी सूचना निकटवती थाने में देनी पड़ती। सेटेलमेंट में रहने वाले को बकायदा पास जारी किए गए थे। ऐसा नहीं है कि इन उपायों से
सब कुछ अंग्रेजों के नियंत्रण में आ गया। अपने दुस्साहस्मिक कारनामों के लिए देशभर में कुरख्यात सुम्हाना डाकू का उदय इसी दौर में चिजनौर के नजीसाबाद किले में बनाए गए संटेलमेंट के बीच ही हुआ।
मेटेलमेट में अंग्रेज सरकार ने इस कदर सख्ती बरती कि उसकी स्मृतियां भांतु समाज के लोगों के जेहन में अब भी ताजा है। यह स्मृतियां आदर्श कॉलोनी के घरों में किस्से कहानियों को तरह सुनी कही जाती हैं। इसी कॉलोनी के निवासी और रेलवे में टीटी के पद पर तैनात संजीव कुमार कहते है, आप आज जो खुशहाली देख रहे हैं वह रातरात नहीं आ गई है। इसके पोछे हमारे पुरखों की तमाम कुनिया है।
1952 में सरकार ने तो हम पर से अपराधी होने का उप्पा हटा लिया, लेकिन पुनर्वास के लिए कोई गंभीर पहल नहीं की। हमारे बड़े बुजुर्गों को समझ में आ गया था कि शिक्षा ही यह रास्ता है, जिसके जरिगे हम आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने अपने बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया।
संजीव कुमार की बात सही लगती है। आज इस कॉलोनी में 1000 से ज्यादातर घर ऐसे हैं जहां लोग सरकारी नौकरियां कर रहे हैं। इनमें से कुछ मामूली पदों पर हैं तो कुछ बड़े अधिकारी भी हैं। मंजीत सिंह रेलवे में इंजीनियर के पद पर है तो जितेंद्र पाल सिंह अध्यापक। रवींद्र सिंह रेलवे पुलिस में काम करते हैं। ममता सिंह एक स्कूल में पढ़ाती है।
आज समाज के कुछ गुमा व्यापार में ती कुछ सियासत में भी हाथ आजमा रहे हैं। धीरे-धीरे ही सही यह जनजाति समाज में मुख्य हिस्सा बन रही है। भांतू समाज के उत्थान के लिए सक्रिय आदर्श कॉलोनी के जसराज सिंह कहते हैं, कभी हमारे पुरखे तीर-कमाल से मुआज का शिकार करते थे। अब हम दफ्तर जाते हैं। दुकान करते हैं। बहुत कुछ बदला है। मगर यह सिर्फ शुरुआत है। अभी हमें लम्बा सफ़र तय करना है।