मुंबई : मुंबई-दिल्ली जैसे महानगर इन दिनों प्रदूषण की चपेट में हैं। महानगरों में ऊंची इमारतें रहती हैं और लोगों को रहता है कि ऊंजी मंजिलों पर रहनेवालों को प्रदूषण का खतरा कम रहता है। पर एक स्टडी ने तो उल्टा ही निष्कर्ष निकाला है। इसके अनुसार, अगर इमारत ३० मंजिली है तो टॉप फ्लोर पर रहना डेंजरस है।
दरअसल, एक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि टॉप फ्लोर पर प्रदूषण का खतरा अधिक होता है। स्टडी में पाया गया है कि जमीन के ऊपर वायु प्रदूषण पारंपरिक सरफेस मॉनिटरिंग स्टेशनों से रिकॉर्ड होने वाले प्रदूषण से ६० फीसदी तक ज्यादा हो सकता है। इससे पता चलता है कि शहर में एयर क्वालिटी मापने के तरीकों में बहुत बड़ी कमी है। सेंसर का इस्तेमाल करके, रिसर्चर्स ने ऊंची इमारतों के बराबर ऊंचाई पर वायु प्रदूषण का लेवल काफी बढ़ा हुआ रिकॉर्ड किया। यह स्टडी आईआईटी दिल्ली ने पांच दिनों तक ड्रोन के जरिए किया था। इसमें सतह से १०० मीटर तक २० मीटर के गैप पर बारीक पार्टिकुलेट मैटर के वर्टिकल डिस्ट्रीब्यूशन को मापा गया। १०० मीटर पर पीएम २.५ का कंसंट्रेशन लगभग १६० माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर था, जो उन्हीं दिनों की सरफेस रीडिंग से लगभग ६० फीसदी ज्यादा था। नतीजों से पता चलता है कि २८–३० मंजिला इमारतों में रहने वालों को ग्राउंड-बेस्ड मॉनिटर से मिले संकेतों से ज्यादा खतरा हो सकता है।
‘सतह के पास शहरी धुंध ज्यादा’
२ फरवरी को नेचर पोर्टफोलियो जर्नल एनपीजे क्लीन एयर में पब्लिश हुई इस स्टडी का टाइटल है, ‘ड्रोन मेजरमेंट से पता चलता है कि सतह के पास शहरी धुंध ज्यादा है’। इस स्टडी में बताया गया है कि यह ज्यादा कंसंट्रेशन सुबह-सुबह की स्थिर, नमी वाली स्थितियों की वजह से है। रिसर्चर्स ने देखा कि धुंध ज्यादातर सुबह के समय होती है।





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