मुंबई, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के विभिन्न प्रावधानों की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली २४१ याचिकाओं पर पैâसला सुनाया। अदालत ने पीएमएलए के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को मिले गिरफ्तारी के अधिकार को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग के तहत गिरफ्तारी मनमानी नहीं है। जस्टिस एएम खानविलकर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की बेंच ने विजय मदनलाल चौधरी ने यूनियन ऑफ इंडिया केस और २४० याचिकाओं पर पैâसला सुनाया है। इसमें पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम के बेटे कार्ति चिदंबरम, महाराष्ट्र सरकार के पूर्व मंत्री अनिल देशमुख, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी गिरफ्तारी, जब्ती और जांच प्रक्रिया को चुनौती दी थी।
याचिका में कहा था कि गिरफ्तारी, कुर्की, जब्ती का अधिकार गैर-संवैधानिक पीएमएलए के तहत गिरफ्तारी, जमानत, संपत्ति की जब्ती या कुर्की करने का अधिकार क्रिमिनल प्रोसीजर एक्ट के दायरे से बाहर है। दायर की गई याचिकाओं में मांग की गई थी कि पीएमएलए के कई प्रावधान गैर संवैधानिक हैं, क्योंकि इनमें संज्ञेय अपराध की जांच और ट्रायल के बारे में पूरी प्रोसेस फॉलो नहीं की जाती है, इसलिए ईडी को जांच के समय सीआरपीसी का पालन करना चाहिए। इस मामले में सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी समेत कई वकीलों ने अपना पक्ष रखा।
सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बेंच को बताया कि पीएमएलए के तहत ४,७०० मामलों की जांच की गई। अब तक केवल ३१३ गिरफ्तारियां हुई हैं। ३८८ केस में तलाशी की गई है। ये यूके, यूएसए, चीन, ऑस्ट्रेलिया, हॉन्गकॉन्ग, बेल्जियम और रूस की तुलना में काफी कम है। ईडी ने पिछले पांच साल में दर्ज ३३ लाख अपराधों में से केवल २१८६ मामलों को जांच करने का पैâसला किया है। ईडी ने अब तक एक लाख करोड़ से ज्यादा की संपत्ति अटैच की है और ९९२ मामलों में चार्जशीट दायर की है।
ब्लैक मनी को लीगल इनकम में बदलना ही मनी लॉन्ड्रिंग है। पीएमएलए देश में २००५ में लागू किया गया। मकसद मनी लॉन्ड्रिंग को रोकना और उससे जुटाई गई प्रॉपर्टी को जब्त करना है। पीएमएलए के तहत दर्ज किए जाने वाले सभी अपराधों की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) करता है। ईडी फाइनेंस मिनिस्ट्री के रेवेन्यू डिपार्टमेंट के तहत आने वाली स्पेशल एजेंसी है, जो वित्तीय जांच करती है। ईडी का गठन १ मई १९५६ को किया गया था। १९५७ में इसका नाम बदलकर ‘प्रवर्तन निदेशालय’ कर दिया गया।





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