मुंबई, आर्थिक मोर्चे पर केंद्र सरकार के ‘अच्छे दिन’ अब और साफ नजर आने लगे हैं। डॉलर के मुकाबले इस साल रुपया रिकॉर्ड ८ फीसदी कमजोर होकर तकरीबन ८१.२० रुपए तक फिसल चुका है। अब यदि अर्थ जगत का अनुमान सही साबित होता है तो इस वर्ष के अंत तक इसके ८३ तक पहुंचने का खतरा है, जो अगले वर्ष बढ़कर डॉलर के मुकाबले ८६ से ८७ तक पहुंच सकता है। इस खतरे के क्या दुष्परिणाम होंगे और उससे केंद्र सरकार वैâसे निपट पाएगी? यह इस समय का यक्ष प्रश्न है।
अर्थशास्त्रियों की मानें तो रुपए की कमजोरी से देश में आयात की लागत बढ़ेगी और देश का निर्यात वैश्विक बाजार में कम प्रतिस्पर्धी हो जाएगा। कच्चे तेल पर इसका सीधा असर पड़ेगा, लिहाजा आम इंसान के जीवन में मुसीबतों का ग्राफ भी तेजी से बढ़ेगा। क्योंकि इस समय अमेरिकी डॉलर सूचकांक २० वर्षों के उच्च स्तर पर है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, अब क्या करती हैं, किस योजना के साथ आगे आती हैं, इस पर पूरे देश की नजर है। हालांकि बाजार को उनसे ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। वित्त मंत्री के तौर पर अर्थ जगत उन्हें कामयाब नहीं मानता। गत वर्ष ऋण मांग के मामले में भी वित्त मंत्री की जिलावार ऋण मेलों की पहल ने कोई खास असर नहीं दिखाया था। कोविड-१९ के बाद आर्थिक सुधार की प्रक्रिया जारी रखने की, उनकी यह कवायद कमजोर ही रही थी। ऋण देने के लिए पहुंच बढ़ाने के उनके तमाम नीतिगत प्रयास तभी से बेअसर रहे हैं। शायद उसी का नतीजा आज रुपए की फिसलन के तौर पर नजर आ रहा है। देश का उद्योग जगत बीते कुछ वर्षों से ऋण कम करने में जुटा है क्योंकि उसे लगता है कि बाजार में एक तो मांग कम है, उस पर केंद्र की नीतियां उद्योग बढ़ाने में सहायक नहीं हैं। इसलिए समय की मांग यह है कि पहले सरकार यह समझने की कोशिश करे कि ऋण वितरण की गति धीमी क्यों है, उसके बाद वह रुपए को मजबूत करने के लिए कारगर कदम उठाए। अन्यथा, आनेवाला समय उद्योग जगत के साथ-साथ, पूरे हिंदुस्थान के लिए कठिनाइयों से भरा होगा।





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