मुंबई : बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना- यह कहावत इन दिनों महाराष्ट्र में चरितार्थ होती दिखाई दे रही है। विधानसभा चुनाव परिणाम बिहार में आए। राष्ट्रीय जनता दल की हार बिहार में हुई, लेकिन इस हार का दर्द शिवसेना को हो रहा है। तेजस्वी यादव के मुंह खोलने से पहले ही शिवसेना का मुंह खुल गया। वह कहने लगी कि तेजस्वी यादव हार गए, ऐसा हम मानने को तैयार नहीं हैं। एक तरफ शिवसेना को तेजस्वी की हार पर भरोसा नहीं हो रहा है, तो दूसरी ओर नीतीश कुमार के पुन: मुख्यमंत्री बनने का श्रेय भी वह खुद ही लेना चाहती है।
उसका मानना है कि पिछले वर्ष इन्हीं दिनों महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद यदि उसने भारतीय जनता पार्टी को झटका देकर कांग्रेस-राकांपा के साथ सरकार न बना ली होती, तो भाजपा बिहार में नीतीश कुमार को जदयू की सीटें कम आने पर भी मुख्यमंत्री बनाने का वादा नहीं करती। शिवसेना एक बार फिर यह बताने की कोशिश कर रही है कि भाजपा नेतृत्व ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले उसके साथ किया गया वादा नहीं निभाया।
निश्चित रूप से आज जदयू को बिहार में भाजपा से काफी कम सीटें पाने का दुख होगा। वास्तव में यही दुख 2014 के बाद से महाराष्ट्र में शिवसेना को भी सालता आ रहा है। छोटे भाई-बड़े भाई की जो बात आज बिहार में होती दिख रही है, वह 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद ही महाराष्ट्र में शुरू हो गई थी।
भाजपा के साथ गठबंधन करके लोकसभा चुनाव लड़ने और भारी सफलता हासिल करने के बावजूद चुनाव के तुरंत बाद से ही शिवसेना ने इस जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता को देने से इन्कार कर दिया था, क्योंकि छह माह बाद ही महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने थे। विधानसभा चुनाव आते-आते शिवसेना-भाजपा का लगभग तीन दशक पुराना गठबंधन टूट गया था। दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़े और शिवसेना भाजपा से करीब आधे पर सिमट गई। यहीं से महाराष्ट्र में बड़ा भाई होने का उसका भ्रम भी टूट गया।
निश्चित रूप से आज जदयू को बिहार में भाजपा से काफी कम सीटें पाने का दुख होगा। वास्तव में यही दुख 2014 के बाद से महाराष्ट्र में शिवसेना को भी सालता आ रहा है। छोटे भाई-बड़े भाई की जो बात आज बिहार में होती दिख रही है, वह 2014 में लोकसभा चुनाव के बाद ही महाराष्ट्र में शुरू हो गई थी।
भाजपा के साथ गठबंधन करके लोकसभा चुनाव लड़ने और भारी सफलता हासिल करने के बावजूद चुनाव के तुरंत बाद से ही शिवसेना ने इस जीत का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रव्यापी लोकप्रियता को देने से इन्कार कर दिया था, क्योंकि छह माह बाद ही महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव होने थे। विधानसभा चुनाव आते-आते शिवसेना-भाजपा का लगभग तीन दशक पुराना गठबंधन टूट गया था। दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़े और शिवसेना भाजपा से करीब आधे पर सिमट गई। यहीं से महाराष्ट्र में बड़ा भाई होने का उसका भ्रम भी टूट गया।





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