मुंबई: गणेशोत्सव महाराष्ट्र में आस्था के साथ कारोबार का भी पर्व है। सुंदर मूर्तियां लोगों को आकर्षित करती हैं और उनके प्यार ने राज्य में मूर्तियों के कारोबार को हजारों करोड़ रुपये के पार पहुंचा दिया है। मगर इस कारोबार पर अब प्रदूषण की नजर लग गई है क्योंकि अदालती आदेश की वजह से सरकार ने प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) की मूर्तियां बनाने, बेचने और विसर्जित करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसकी सीधी चोट मूर्तिकारों के कारोबार और राज्य के सबसे बड़े पर्व गणेशोत्सव पर पड़ने वाली है।
अदालत के फैसले से महाराष्ट्र के करीब तीन लाख मूर्तिकारों का कारोबार चौपट हो रहा है। यहां ज्यादातर मूर्तियां गणेशोत्सव के लिए ही बनती हैं मगर राज्य के कुछ हिस्सों में मूर्तियों के कारखाने साल भर चलते रहते हैं। रायगढ़ जिले की पेण तहसील और इसके आसपास का क्षेत्र गणपति की मूर्तियों का केंद्र माना जाता है। करीब के गांव हमरापुर, कलवा, जोहा, तांबडशेत, दादर, रावे, सोनकार, उरनोली, हनमंत पाडा, वडखल, बोरी, शिर्की में गणेशोत्सव के 10 दिन और पितृपक्ष के 15 दिन छोड़कर साल भर घर-घर में 6 इंच से 12 फुट की मूर्तियां बनती रहती हैं। इस क्षेत्र में ऐसी 1,600 इकाइयां हैं, जिनका सालाना कारोबार 250 से 300 करोड़ रुपए का है और साल में 3 से 3.25 करोड़ मूर्तियां बनती हैं। इनमें से करीब 1.25 करोड़ मूर्तियां गोवा, गुजरात, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के थोक व्यापारियों के पास जाती हैं, जहां से देश भर में पहुंचती हैं।
पीओपी पर प्रतिबंध की बात से मूर्तिकारों में गहरा आक्रोश है और वे मूर्तियां इसी से बनाने पर अड़े हैं। उनका कहना है कि रोक नहीं हटी तो प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्ति बनाने नाले 2 लाख परिवार भूखे मर जाएंगे। रसायन विज्ञान के विशेषज्ञ डॉ जयंत गाडगिल भी मूर्तिकारों का पक्ष लेते हुए कहते हैं कि समुद्र में लाखों तरह के जहर पहुंच रहे हैं और केवल पीओपी को प्रदूषण का कारण नहीं माना जाए। उन्होंने कहा कि मूर्तियां शाडू मिट्टी से भी बनती हैं, जिसमें 8 हानिकारक तत्व मिलते हैं, जबकि प्लास्टर ऑफ पेरिस में ऐसे तत्व केवल दो हैं। साथ ही पीओपी का दोबारा इस्तेमाल हो सकता है और सल्फर तथा कैल्शियम हटा लें तो इसमें 85 फीसदी मिट्टी ही होती है।
लालबाग के राजा की मूर्ति बनाने वाले संतोष रत्नाकर कांबले भी यही तर्क देते हैं। उनका कहना है कि पीओपी पानी में मिट्टी के मुकाबले देर में घुलता है, इसलिए यह शाडू मिट्टी के मुकाबले बेहतर है। उनका कहना है कि सरकार शाडू मिट्टी के कम हानिकारक विकल्प दे रही है तो पीओपी के भी दे वरना पाबंदी हटाए।
मूर्तिकारों के पास दूसरे तर्क भी हैं। उनका कहना है कि मिट्टी से दो-ढाई फुट से ऊंची मूर्ति नहीं बन सकती क्योंकि उसमें दरार आ जाती है और टूट सकती है। गणोशोत्सव पर 36 फुट तक ऊंचाई वाली मूर्तियों की मांग रहती है। साथ ही मिट्टी की मूर्ति पीओपी मूर्ति से 40 फीसदी महंगी पड़ती है और पीओपी जैसी बारीक कारीगरी भी उसमें नहीं हो पाती। ऐसे में पीओपी पर रोक से गणेशोत्सव और महाराष्ट्र की संस्कृति पर गहरी चोट पड़ेगी।





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