मुंबई : मुंबई महानगरपालिका चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे मुंबई के अगले महापौर को लेकर राजनीतिक लड़ाई तेज होती जा रही है. अब यह मुकाबला सिर्फ सत्ता और प्रशासन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पहचान, अस्मिता और नैरेटिव की राजनीति में बदल चुका है. भाजपा, शिवसेना (यूटीबी), मनसे गठबंधन, एआईएमआईएम और महायुति-सभी अपने-अपने बयान और पोस्ट के जरिये एक-दूसरे पर हमला बोल रहे हैं.
ठाकरे ब्रदर्स का नैरेटिव: ‘महापौर मराठी होगा’
ठाकरे ब्रदर्स-राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे-के गठबंधन की आधिकारिक घोषणा के साथ ही एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश सामने आया. दोनों नेताओं ने यह नैरेटिव सेट किया कि ‘मुंबई का महापौर मराठी होगा और ठाकरे ब्रदर्स के गठबंधन से होगा.’
इस बयान को मराठी अस्मिता और स्थानीय नेतृत्व के मुद्दे से जोड़कर देखा जा रहा है. विपक्षी दलों का आरोप है कि ठाकरे गुट चुनाव को प्रशासनिक मुद्दों से हटाकर भावनात्मक पहचान की ओर मोड़ रहा है.
एआईएमआईएम की एंट्री और नया मोड़
बीएमसी चुनाव में अकेले उतर रही एआईएमआईएम ने ठाकरे ब्रदर्स के इस नैरेटिव को सीधे चुनौती दी. एआईएमआईएम नेता वारिस पठान ने कहा, ‘हम संविधान और सेक्युलरिज्म में विश्वास रखते हैं. खान, पठान या बुर्का पहनने वाली महिला भी मुंबई की महापौर बन सकती है.’
इस बयान के बाद चुनावी बहस ने नया मोड़ ले लिया. अब चर्चा सिर्फ मराठी बनाम गैर-मराठी नहीं रही, बल्कि धर्म और सेक्युलरिज्म भी केंद्र में आ गए.
भाजपा-शिंदे शिवसेना (महायुति) का स्टैंड
भाजपा और एकनाथ शिंदे की शिवसेना ने, जो बीएमसी चुनाव में महायुति के तौर पर मैदान में हैं, स्पष्ट रुख अपनाया है. महायुति का कहना है, ‘मुंबई का महापौर मराठी होगा और हिंदू होगा.’ साथ ही, ठाकरे ब्रदर्स पर यह आरोप भी लगाया गया कि वे हिंदुओं को बांटने की राजनीति कर रहे हैं.
कृपाशंकर सिंह के बयान से सियासी विस्फोट
इस पूरे विवाद को और भड़काने वाला बयान भाजपा नेता कृपाशंकर सिंह का रहा. उन्होंने कहा, ‘हम यह सुनिश्चित करेंगे कि ज्यादा से ज्यादा उत्तर भारतीय चुने जाएं और मुंबई का महापौर उत्तर भारतीय होगा.’ इस बयान के बाद सियासी तूफान खड़ा हो गया. शिवसेना (यूटीबी) सांसद संजय राउत ने कृपाशंकर सिंह का वीडियो एक्स (पूर्व ट्विटर) पर साझा करते हुए लिखा, ‘भाजपा ने तय कर लिया है – मुंबई का महापौर बाहरी होगा! मराठी लोगों… जागो!’
यह पोस्ट ठाकरे गुट के उस पुराने राजनीतिक नैरेटिव को फिर से सामने लाती है, जिसमें मुंबई की सत्ता को ‘बाहरी बनाम मराठी’ के रूप में पेश किया जाता रहा है.





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