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आईपीएस अफसरों की वार्षिक एक ही अनिवार्य चिकित्सीय जांच के लिए दर्जनों दरें तय कर दी गर्इं

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मुंबई : मुंबई से छत्रपति संभाजीनगर तक आईपीएस अफसरों की वार्षिक एक ही अनिवार्य चिकित्सीय जांच के लिए दर्जनों दरें तय कर दी गर्इं, जिसमें कहीं ५,००० रुपए तो कहीं सीधे १७,२०० रुपए तय की गई है। जारी शासनादेश में सबसे चौंकानेवाला तथ्य यह है कि महिला-पुरुषकर्मियों और अफसरों की जांच दरों में भी हजारों रुपए का अंतर दिखाया गया है। विपक्ष का आरोप है कि इस पूरी व्यवस्था में आईपीएस अफसरों को ढाल बनाया गया, जबकि असली फायदा चुनिंदा निजी अस्पतालों की तिजोरियों में डालने की योजना है। महंगे अस्पतालों को ही प्राथमिकता और न्यूनतम दर के दावे के बीच अधिकतम भुगतान को लेकर सवाल उठने लगा है कि जब सस्ती जांच संभव थी तो आखिर किस दबाव में महंगी अनुमति दी गई?
महायुति सरकार की नई नीति ने एक बार फिर प्रशासनिक पैâसलों की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारतीय पुलिस सेवा के महाराष्ट्र संवर्ग के अधिकारियों और कर्मचारियों की वार्षिक चिकित्सीय जांच को लेकर जारी सरकारी आदेश अब राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गया है। सरकारी आदेश के मुताबिक, अधिकारियों को पहले अपनी जेब से जांच का खर्च उठाना होगा और बाद में सीमित प्रतिपूर्ति मिलेगी। विपक्ष का कहना है कि यह व्यवस्था अपने-आप में पक्षपाती है, क्योंकि न्यूनतम दर का दावा करने के बावजूद सूची में ऐसे अस्पताल शामिल किए गए हैं, जहां शुल्क आसमान छू रहा है। मुंबई में जहां कुछ अस्पतालों में ५,००० रुपयों में जांच संभव है, वहीं कुछ नामचीन निजी अस्पतालों में यही जांच पुरुष अधिकारियों के लिए १५,४०० रुपए और महिला अधिकारियों के लिए १७,२०० रुपए तक पहुंच रही है।