मुंबई : महज एक छोटी सी गलती की वजह से आईआईटी-बॉम्बे में अपनी सीट गंवाने वाले 18 साल के स्टूडेंट को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से बड़ी राहत मिली है। सर्वोच्च अदालत ने फैसले में आईआईटी बॉम्बे को स्टूडेंट को इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग में बी-टेक कोर्स जॉइन करने की इजाजत देने का निर्देश दिया है। जस्टिस एस. के. कौल, दिनेश माहेश्वरी और हृषिकेश रॉय की बेंच ने बुधवार को मामले की वर्चुअल सुनवाई करते हुए आईआईटी कॉउन्सिल से कहा, ‘हमें बताइए कि आप क्यों इजाजत नहीं दे रहे हैं। यह सही नहीं है। जब किसी का ऐडमिशन पूरा हो गया है…तो फिर दाखिला पा चुका एक मेरिटोरियस स्टूडेंट इसे कैंसल क्यों करना चाहेगा?’ दरअसल ऑनलाइन प्रक्रिया में एक गलत क्लिक की वजह से उसे ऐडमिशन नहीं मिला।
बेंच के सामने आईआईटी काउन्सिल सोनल जैन ने नियमों का हवाला देते हुए कहा, ‘बत्रा ने जॉइंट सीट एलॉकेशन अथॉरिटी (JoSSA) के तहत सीट को फिक्स किया था। उसमें स्पष्ट था कि उसे आगे के राउन्डस के लिए नहीं जाना पड़ेगा। लेकिन बत्रा ने जानबूझकर आठ चरणों की प्रक्रिया से विथड्रॉ का फैसला किया। नियमों के अनुसार फिर से रिस्टोरेशन की इजाजत नहीं है। जस्टिस कौल ने कहा, ‘हम तीनों ने इस बात पर चर्चा की है। हम सभी एकमत हैं। हम सीट की इजाजत देते हैं। कॉमन सेंस नाम की भी कोई चीज होती है।’ बेंच ने आईआईटी काउन्सिल से कई बार पूछा कि सीट से नाम वापस लेने के लिए स्टूडेंट की तरफ से क्या वजह दी गई। स्टूडेंट ने हाई कोर्ट के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
मां-बाप दोनों को खो चुके आगरा के 18 वर्षीय सिद्धांत बत्रा को अक्टूबर में IIT JEE (अडवांस्ड) 2020 में ऑल इंडिया 270 रैंक मिली थी। उसे IIT-बॉम्बे में इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग में बीटेक की सीट भी मिल गई। पर एक छोटी सी चूक से उसके सपनों पर ग्रहण लगने लगा। हुआ यह कि 18 अक्टूबर को वह सीट बंटवारे के पहले राउंड को पूरा कर चुका था। 31 अक्टूबर को अपने रोल नंबर के अपडेट देखते समय उसे एक लिंक मिला, जिस पर लिखा था, ‘सीट निर्धारण और अगले राउंड से विदड्रॉ’। उसने यह सोचकर इस पर क्लिक कर दिया कि उसे मनचाही सीट मिल गई है इसलिए उसे अब अगले राउंड की जरूरत नहीं।
लेकिन 10 नवंबर को उसने पाया कि उसका नाम इलेक्ट्रिकल इंजिनियरिंग कोर्स में प्रवेश पाने वाले छात्रों की लिस्ट में नहीं है। इस कोर्स के लिए कुल 93 सीटें थीं। उसने राहत पाने के लिए बॉम्बे हाई कोर्ट में अपील की। इस पर 19 नवंबर को सुनवाई, अदालत ने आईआईटी से उसकी अपील पर विचार करने को कहा लेकिन संस्थान ने उसे यह कहते हुए ठुकरा दिया कि नियमत: उसे ऐसे करने का अधिकार नहीं है। प्रवेश के लिए अब सिद्धांत को अगले साल फिर से इस परीक्षा में बैठना होगा। इसके बाद स्टूडेंट ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।





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