मुंबई: विलीनीकरण की मांग को लेकर एसटी कर्मचारी पिछले 100 दिनों से हड़ताल पर अड़े हुए हैं। ग्रामीण इलाकों में राज्य की जीवनवाहिनी कही जाने वाली एसटी बसों के पहिए थमने से आम लोग हलाकान हैं, जबकि सरकार की तमाम कोशिशों के बावजुद एसटी कर्मचारियों द्वारा अपना आंदोलन वापस न लेना शासन-प्रशासन दोनों के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
कोरोना की तीसरी लहर शांत होने के बाद अब अंतर्राज्यीय यात्रा औ2/3/2022र पर्यटन पर लगी रोक हटा ली गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल शुरू हो गए हैं। राज्य के ग्रामीण इलाकों की जीवन रेखा कही जाने वाली एसटी हड़ताल खिंच गई है। गुरुवार को एसटी हड़ताल का 100वां दिन था , ऐसे में यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एसटी के अलावा वैकल्पिक यातायात व्यवस्था काफी महंगी साबित हो रही है। इससे यात्रियों के सब्र का बांध टूट रहा है। कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से लगभग 90 प्रतिशत एसटी का आवागमन ठप है। कोरोना के पहले प्रदेश में लगभग एक लाख एसटी ट्रिप लगते थे। इस समय लगभग 9 हजार फेरे ही हो रहें हैं। नतीजतन, 90 एसटी यातायात बंद है। यूनियन का दावा है कि पिछले 100 दिनों में कुल 80 एसटी कर्मचारियों और उनके परिवारों ने आत्महत्या की है। निगम के अनुसार जनवरी के अंत तक निगम के 92,266 कर्मचारियों में से 27,127 संपर्क अधिकारी काम पर लौट चुके हैं। 11,024 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। एसटी निगम ने दावा किया कि 250 डिपो में से 243 डिपो पर काम शुरू है। एसटी कर्मचारियों की हड़ताल को देखते हुए पिछले दिनों एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार ने पहल करते हुए बैठक बुलाकर हड़ताल समाप्त कराने की कोशिश की, परंतु कर्मचारी विलीनीकरण की मांग पर अड़े ही हैं। हाईकोर्ट ने मामले पर फैसला करने के लिए मुख्य सचिव के साथ तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया। इस समिति को दिया गया 12 सप्ताह का कार्यकाल भी गुरुवार को समाप्त हो गया है। अदालत ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को रिपोर्ट पर अपनी राय देने का निर्देश दिया है। रिपोर्ट में विलय के फैसले पर एसटी कर्मचारियों सहित राज्य के लोगों का ध्यान है।





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