मुंबई, बढ़ती आत्महत्या की घटनाएं एक ऐसा बदनुमा दाग है, जो हमारे तमाम विकास एवं शिक्षित होने के दावों को खोखला करता है। आत्महत्या शब्द जीवन से पलायन का डरावना सत्य है जो दिल को दहलाता है, डराता है, खौफ पैदा करता है, दर्द देता है। इसका दंश वे झेलते हैं जिनका कोई अपना आत्महत्या कर चला जाता है, उनके प्रियजन, रिश्तेदार एवं मित्र तो दुखी होते ही हैं, संपूर्ण मानवता भी आहत एवं शर्मसार होती है। एक रिपोर्ट के अनुसार, २०१९ में भारत में १.३९ लाख लोगों ने आत्महत्या की, जिनमें से लगभग ४५ फीसदी लोग तनाव, अवसाद, बायपोलर डिसऑर्डर, सिजोप्रâेनिया जैसी समस्याओं का सामना कर रहे थे। ऐसे में यह कहा जा सकता है कि आत्महत्या के प्रमुख कारणों में तनाव, हिंसा, अवसाद, निराशा, नकारात्मकता सहित अन्य मानसिक समस्याएं, गंभीर रोगों के चलते निराशा, सामाजिक संघर्ष या दबाव न झेल पाना, अज्ञानता आदि शामिल हैं। ऐसी विभिन्न स्थितियों में व्यक्ति खुद को अकेला मानने लगता है और कई बार ऐसे निराशाजनक कदम उठा लेता है।
आत्महत्या की बढ़ती डरावनी स्थितियों को कम करने के लिए एवं आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं पर नियंत्रण पाने के लिए विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस प्रतिवर्ष १० सितंबर को मनाया जाता है, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सहयोग से अंतर्राष्ट्रीय एसोसिएशन फॉर आत्महत्या रोकथाम (इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर सुसाइड प्रवेंशन-आईएएसपी) द्वारा आयोजित किया जाता है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो ने हाल में भारत में आत्महत्या के जो आंकड़े जारी किए हैं, वे चिंताजनक हैं। किसी भी समाज और देश के लिए यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। कोई शख्स आत्महत्या को आखिरी विकल्प क्यों मान रहा है? नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक देश में आत्महत्या के मामलों में ३.६ फीसदी की बढोतरी हुई है और औसतन देश में हर दो घंटे में तीन लोग जान दे रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार २०१८ में कुल १,३४,५१६ लोगों ने खुदकुशी की, जो २०१७ के १,२९,८८७ आत्महत्या के मामलों के मुकाबले ३.६ फीसदी अधिक है और यह आगामी वर्षों में लगातार बढ़ती जा रही है।
लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि देश में छात्रों की आत्महत्या की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के २०१८ के आंकड़ों से स्टूडेंट्स की आत्महत्या को लेकर बेहद चिंताजनक तथ्य सामने आए हैं। २०१८ में लगभग १०,१५९ छात्रों ने आत्महत्या की है। इनमें से एक चौथाई ने इम्तिहान में फेल होने के डर से आत्महत्या की। इसके अलावा प्रेम में नाकामी, उच्च-शिक्षा के मामले में आर्थिक समस्या, अच्छा प्लेसमेंट न मिलना और बेरोजगारी भी छात्रों की आत्महत्या की प्रमुख वजह के रूप में सामने आई है। आंकड़ों के मुताबिक एक दशक में लगभग ८२ हजार छात्रों ने आत्महत्या जैसा अतिरेक कदम उठाया है। महाराष्ट्र में १४४८ छात्रों के आत्महत्या के सबसे अधिक मामले सामने आए हैं।





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