मुंबई, एक तरफ महंगाई से पूरा देश त्रस्त है, दूसरी ओर मोदी सरकार हो या आरबीआई, दोनों में ही तालमेल का अभाव है और वे इसके ऊपर नियंत्रण लगा पाने में असफल साबित हो रहे हैं। खासकर खाने-पीने के सामान पर तो सरकार का कोई जोर ही नहीं है। कृषि क्षेत्र का असंतुलित पैदावार को ठीक करने के लिए सरकार के पास कोई कार्यक्रम नहीं है। इसका परिणाम यह होता है कि जो टमाटर एक दिन १० रुपए किलो मिल रहा होता है, वह चंद दिनों में २५० रुपए किलो किलो बिकने लगता है। इन दिनों प्याज और दाल की कीमतों ने तेजी पकड़ रखी है। दाल का दाम तो सीधे दोगुना हो चुका है। चावल व सब्जियों के दामों में भी खासी तेजी आई है। इसका नतीजा है कि कई राज्यों ने महंगाई के राष्ट्रीय औसत का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है।
गौरतलब है कि इस साल सितंबर में एक दर्जन से अधिक राज्यों में राष्ट्रीय औसत से अधिक महंगाई दर्ज की गई। सरकारी आंकड़ों ने अनुसार राजस्थान में जीवनयापन का खर्च पिछले साल के मुकाबले इस साल ६.५३ फीसदी बढ़ गया, जबकि हरियाणा में इसमें ६.४९ फीसदी और कर्नाटक में ६ फीसदी का इजाफा हुआ। हिंदुस्थान में कुल मिलाकर महंगाई ५.०२ फीसदी बढ़ी है। इसके अलावा जिन राज्यों में महंगाई बढ़ी है, उनमें तेलंगाना, ओडिशा, उत्तराखंड, बिहार, पंजाब, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और झारखंड जैसे राज्य शामिल हैं। इन राज्यों में महंगाई ५.०७ फीसदी से लेकर ५.९७ फीसदी के बीच बढ़ी है।
जहां तक महंगाई का सवाल है तो खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी मानते हैं कि देश में महंगाई है। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद देश की जनता के सामने इसे स्वीकार किया था। उन्होंने कहा था कि हिंदुस्थान मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने की पूरी कोशिश कर रहा है और कुछ सफलताएं भी मिली हैं। पीएम ने कहा था, ‘मुझे अपने देशवासियों पर मुद्रास्फीति के बोझ को कम करने के लिए इस दिशा में और कदम उठाने होंगे।’ यानी ९ साल तक देश की बागडोर संभालने के बाद वे खुद महंगाई की बात स्वीकार कर रहे हैं। ये वही मोदी हैं जो पहले महंगाई के मामले में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर शाब्दिक हमले किया करते थे। पर जब खुद कमान संभाली तो महंगाई पर रोक लगा पाने में असफल साबित हुए।
जहां तक महंगाई का सवाल है तो आरबीआई भी इस मामले में फेल साबित हो रही है। हालांकि, आरबीआई से जुड़े अधिकारी सरकार की गलत आर्थिक नीतियों का बचाव करते हुए मुद्रास्फीति को वैश्विक चिंता बताने से नहीं चूकते। उनके अनुसार, जब विश्व अर्थव्यवस्था दबाव में है, तो हिंदुस्थान जैसी उभरती प्रमुख अर्थव्यवस्था के लिए कुछ झटके झेलना अनिवार्य है। यूक्रेन में चल रहे युद्ध ने तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को खतरे में डाला ही है, आनेवाले दिनों में इजरायल-हमास युद्ध का भी महंगाई पर असर दिखेगा। बहरहाल, सच्चाई तो यही है कि मुद्रास्फीति अब बढ़ रही है और हिंदुस्थानियों को अंतत: खुदरा दुकानों पर अधिक पैसा खर्च करना पड़ रहा है। खासकर खाद्य पदार्थों के लिए। इनमें अनाज और सब्जियां प्रमुख हैं।





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