मुंबई: कानून के मजबूत ढांचे के बावजूद हर तबके तक न्याय की पहुंच सुनिश्चित करने की चुनौती बनी हुई है। माना जा रहा है कि ‘रिस्टोरिंग दी यूथ कैंपेन’ की बदौलत यह चुनौती आसान हुई है। इस कैंपेन के तहत महाराष्ट्र भर की जेल में बंद ऐसे आरोपियों की पहचान की गई है, जो अपराध के समय जुवेनाइल (किशोर) थे, लेकिन किसी कारणवश अथवा मार्गदर्शन के अभाव में खुद के नाबालिग होने का दावा नहीं कर पाए। 18 साल से कम उम्र के बच्चे जुवेनाइल के दायरे में आते हैं। जेल में बंद ऐसे जुवेनाइल को प्रभावी कानूनी सहायता उपलब्ध कराना कैंपेन का उद्देश्य है, जिससे वे जेल की दुनिया से बाहर आ सके और उनके केस को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (जेजेबी) के पास भेजा जा सकें।
ऐसे शुरू हुआ कैंपेन
हाल ही सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐसे आरोपी को रिहा करने का निर्देश दिया था। जो 2003 में अपराध के समय जुवेनाइल था। इसके बावजूद वह आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। इस केस के मद्देनजर रिस्टोरिंग दी यूथ अभियान शुरू किया गया। ताकि आरोपी को केस के सही पड़ाव पर खुद के जुवेनाइल होने का दावा करने का अवसर दिया जा सके। वैसे भी न्याय प्रशासन का सिद्धांत है कि भले दोषी छूट जाए, लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। 18 साल से कम उम्र के बच्चे जुवेनाइल के दायरे में आते है। पिछले दिनों नेशनल लीगल सर्विसेस ऑथरिटी के निर्देश पर महाराष्ट्र विधि सेवा प्राधिकरण ने जेलों में जुवेनाइल की पड़ताल की मुहिम शुरू की थी। अभियान के तहत खासतौर से जेल में बंद ऐसे युवा आरोपियों से पूछताछ की गई, जिनकी उम्र 18 से 22 साल के बीच थी। मुहिम के दौरान 113 आरोपियों से पूछताछ की गई, जिन्होंने अपराध के समय जुवेनाइल होने का दावा किया था।
पड़ताल में आरोपियों के परिवारवाले आरोपी की जन्म तारीख से जुड़े दस्तावेज मांगे गए। आरंभिक स्क्रूटनी के बाद संबंधित इलाके के कोर्ट में 32 आवेदन दायर किए गए। इनमें से 4 अर्जियां खारिज हो चुकी हैं। जबकि 28 आवेदन अभी विचार के लिए पेंडिंग है।





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