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आम चुनाव में महत्त्वपूर्ण है महाराष्ट्र की भूमिका

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मुंबई: 48 सीट वाला महाराष्ट्र आम चुनाव की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है और पश्चिमी मोर्चे पर जीत सभी दलों के लिए बहुत मायने रखती है।
इस विषय पर शायद ही कोई मतभेद है कि लोक सभा की 545 में से 48 सीट के साथ महाराष्ट्र आगामी 4 जून को आम चुनाव के नतीजे आने के बाद बनने वाली नई सरकार के निर्माण में संतुलन कायम करने की भूमिका निभाएगा।
महाराष्ट्र में 20 मई को मतदान हो चुका है और उसके बाद आ रही जमीनी खबरें दिलचस्प स्थिति की ओर इशारा कर रही हैं।
वर्ष 2014 और 2019 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को महाराष्ट्र में स्पष्ट जीत मिली थी। राजग ने 2014 में 42 और 2019 में 41 सीट पर जीत हासिल की थी।
प्रधानमंत्री ने 2019 में प्रदेश में नौ जनसभाओं को संबोधित किया था। उन्होंने इस बार प्रदेश में 17 जनसभाओं को संबोधित करने के अलावा कई रोड शो भी किए। वह राज्य में दो बार रात में भी रुके जो अपने आप में काफी अस्वाभाविक नजर आता है।
पार्टी के पारंपरिक साथियों ने 2019 और 2024 के बीच उसका साथ छोड़ दिया और भाजपा को मजबूरन नए मित्र तलाशने पड़े। मई 2019 के आम चुनाव में पार्टी प्रदेश में उद्धव ठाकरे की शिव सेना के साथ मिलकर आम चुनाव में उतरी थी।
अक्टूबर 2019 में हुए विधानसभा चुनाव के बाद उद्धव ठाकरे ने भाजपा का साथ छोड़ दिया और विपक्षी कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ जा मिले। माना जाता है कि इस अलगाव की पटकथा शरद पवार ने लिखी।
अपमानित भाजपा ने अंदर ही अंदर शरद पवार से हिसाब बराबर करने की ठानी। उसने ऐसा ही किया और शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को दो फाड़ करके एकनाथ शिंदे को नया मुख्यमंत्री बनने में मदद की।
भाजपा की विदर्भ इकाई के सचिव संजय फांजे बहुत संतुष्टि के साथ कहते हैं, ‘जब सुप्रिया ताई (पवार की बेटी और बारामती से सांसद) कहती हैं कि हमारा एकमात्र निशाना शरद पवार हैं तो वह सही कहती हैं। शरद पवार ने हमारा गठबंधन तोड़ा तो हमने उनका तोड़ा।’
शरद पवार के भतीजे और राष्ट्रवादी कांग्रस पार्टी के कार्यकारी प्रमुख अजित पवार भी अपने अंकल की छाया से निकलकर भाजपा के साथ चले गए।