मुंबई : सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि मुंबई कोस्टल रोड (साउथ) के पास स्थित वह रीक्लेम्ड भूमि, जिसे रिलायंस इंडस्ट्रीज़ को लैंडस्केपिंग और विकास कार्यों के लिए सौंपा गया है, सामान्य रूप से आम जनता के लिए खुली रहनी चाहिए। इस टिप्पणी के साथ कोर्ट ने उस जनहित याचिका का निपटारा कर दिया, जिसमें बृहन्मुंबई महानगरपालिका द्वारा जारी एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत निजी एजेंसियों को कोस्टल रोड के किनारे की रीक्लेम्ड भूमि पर लैंडस्केपिंग और मेंटेनेंस का काम दिया जाना था।
जस्टिस जे.के. महेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चंद्राकर की खंडपीठ ने कहा कि 30 सितंबर 2022 के अपने पहले के आदेश में कोर्ट पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि इस रीक्लेम्ड भूमि का किसी भी प्रकार से आवासीय या व्यावसायिक उपयोग नहीं किया जा सकता — न वर्तमान में और न ही भविष्य में। कोर्ट ने दोहराया कि यह भूमि केवल सार्वजनिक उपयोग और सौंदर्यीकरण के उद्देश्य से ही विकसित की जा सकती है। खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि “धर्मवीर स्वराज्यरक्षक छत्रपति संभाजी महाराज मुंबई कोस्टल रोड (साउथ)” परियोजना के अंतर्गत जो क्षेत्र कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी के तहत किसी निजी संस्था को विकास के लिए दिया गया है, वह सामान्यतः जनता के लिए खुला रहेगा। केवल उन्हीं हिस्सों में अस्थायी प्रतिबंध लगाया जा सकता है, जहां विकास या रखरखाव का कार्य चल रहा हो। ऐसे सभी कार्य बीएमसी के निर्देश और निगरानी में किए जाएंगे।
याचिकाकर्ता जिपनेश नरेंद्र जैन ने आशंका जताई थी कि अगर रिलायंस जैसी कॉर्पोरेट संस्था को पूरा नियंत्रण दे दिया गया तो क्षेत्र का व्यावसायीकरण हो सकता है और आम लोगों की पहुंच सीमित हो सकती है। उन्होंने यह भी मांग की थी कि ऐसे कार्यों के लिए खुली निविदा प्रक्रिया अपनाई जाए, ताकि एनजीओ, आर्किटेक्ट और अन्य संस्थाएं भी भाग ले सकें। हालांकि, कोर्ट ने माना कि 2022 के आदेश से याचिकाकर्ता की चिंताओं का समाधान हो चुका है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह यह सुनिश्चित करेगा कि यह इलाका निजीकरण या व्यावसायीकरण की ओर न जाए और जनता की पहुंच बनी रहे। याचिका में यह भी मांग की गई थी कि कोस्टल रोड के किनारे की रीक्लेम्ड जमीन और प्रोमनेड को “पब्लिक ट्रस्ट प्रॉपर्टी” और “कोस्टल कॉमन्स” घोषित किया जाए, ताकि इसे किसी निजी संस्था के दीर्घकालिक नियंत्रण में न दिया जा सके। साथ ही, पर्यावरण मंत्रालय और राज्य सरकार से ऐसी नीति बनाने की मांग की गई थी जो इन क्षेत्रों को गैर-व्यावसायिक और सार्वजनिक उपयोग के लिए सुरक्षित रखे। इन सभी पहलुओं पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप से इनकार करते हुए याचिका का निपटारा कर दिया, लेकिन यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि यह क्षेत्र सामान्यतः जनता के लिए खुला रहना चाहिए और किसी भी प्रकार का व्यावसायीकरण स्वीकार्य नहीं होगा।





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