पुणे : मानव सभ्यता में आधुनिक प्रकाश यंत्रों के आविष्कार के प्रयासों ने हजारों साल लंबी यात्रा तय की। तब जाकर आज ऐसे प्रकाश यंत्र सुलभ हैं, जो सिर्फ एक स्विच दबाने से उजाला कर देते हैं। बल्ब की खोज से पहले लोग लैंप, लालटेन और दीपकों का इस्तेमाल प्रकाश के लिए करते थे। पुणे के रहने वाले एक कारोबारी श्याम मोटे के पास पुराने जमाने के ऐसे ही कई दीपकों का संग्रह है। इनमें से कई 100 से 150 साल पुराने हैं।
पुराने दीयों और लैंप्स को जुटाने का शौक रखने वाले मोटे के पास नए-पुराने 250 दीये हैं, जो उन्होंने 25 सालों की मेहनत के बाद जुटाए हैं। इनमें जो सबसे पुराना है, वह 150 साल का है। श्याम के पास सबसे नया दीपक 50 साल पुराना है। मोटे बताते हैं कि उन्हें चीजों को जुटाने का शौक है। एक बार उन्हें दो पुराने जमाने के लैंप्स मिले थे। दोनों लैंप इंग्लैंड में बने थे और काफी पुराने थे। उन्होंने इन लैंप्स के पार्ट्स अलग-अलग कर दिए और उन्हें साफ किया। उन्होंने लैंप के पार्ट्स की स्टडी की। मोटे ने बताया कि इसके बाद से ही उन्हें पुराने लैंप्स में इंट्रेस्ट आने लगा।
मोटे ने इसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने पुराने दीयो और लैंप्स को जुटाने का सिलसिला शुरू किया। देश-विदेश की यात्रा करने के बाद मोटे के पास कुल 250 पुराने लैंप्स हैं जो 50 से 150 साल पुराने हैं। श्याम के पास दो सबसे बेशकीमती लैंप है, वह विक्टोरिया बग्घी पर रखा हुआ दीपक है। इसके भीतर एक पंखा लगा हुआ है। इसके अलावा एक साइकिल लैंप, मोमबत्तियों वाला रेलवे सिग्नल लैंप, कोयला खदानों में इस्तेमाल किया जाने वाला ब्रेक-प्रूफ लैंप, जहाजों आदि में इस्तेमाल किया जाने वाला तूफानी लैंप और तकरीबन 100 साल पुरानी कार लाइट्स भी मोटे के कलेक्शन में मिलेंगी।
श्याम मोटे ने बताया कि उन्होंने इन लैंप्स को जुटाने और उन्हें स्टडी करने में अपने जीवन के अनगिनत घंटे खर्च किए हैं। उन्होंने कहा कि इन लैंप्स को बनाने के लिए लोगों ने जिस शिल्प और टेक्नॉलजी का इस्तेमाल किया था, वह आज नहीं मिलतीं। दीपकों में जो शीशे इस्तेमाल किए गए हैं, वे ग्लास ब्लोअर और हाथों से डिजाइन किए गए हैं। उन्होंने कहा कि पहले के जमाने में लैंप धातुओं के बनते थे। बाद में शीशे का इस्तेमाल शुरू हो गया। थोड़ा और विकास हुआ तो रंगीन लैंप्स सामने आने लगे।
उन्होंने बताया कि ज्यादातर लैंप शुरू में सिंगल फ्लेम थे लेकिन समय बीतने के साथ जब लोगों को ज्यादा रोशनी की जरूरत महसूस होने लगी तो उन्होंने डबल फ्लेम वाले लैंप्स बनाने शुरू किए। मोटे के कलेक्शन में ज्यादातर लैंप्स इंग्लैंड, जर्मनी, ऑस्ट्रिया और फ्रांस में बने हैं। उन्होंने बताया कि इन लैंपों को पेट्रोमैक्स, डिटमार, हिंक्स और अन्य कंपनियां बनाती थीं। ये कंपनियां अब बंद हो चुकी हैं, ऐसे में इन लैंप्स के स्पेयर पार्ट्स मिलना मुश्किल है।
श्याम ने बताया कि वे जहां कहीं भी कांच या बर्नर पाते हैं, उसे अपने पास रख लेते हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास अभी जितने लैंप्स हैं, सब काम करते हैं। उनमें जंग न लगे इसलिए वह उनकी हर 6 महीने पर सफाई करते रहते हैं। श्याम ने बताया कि वह हर साल इन दीपकों के लिए प्रदर्शनी लगाते हैं। वह अपने कलेक्शन में और दीपकों को जोड़ने को आगे भी जारी रखना चाहते हैं।





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