मुंबई, जो गुनाह करता है उसे सजा मिलनी ही चाहिए। लेकिन जिन लोगों को सजा मिलती है क्या हकीकत में वो सभी गुनहगार ही होते हैं? नहीं, कोई जरूरी नहीं है कि सजा पानेवाला आरोपी हर बार गुनहगार ही होता हो। भले ही कानून कहता है कि सौ गुनहगार सजा से बच जाएं लेकिन एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए और इसकी जिम्मेदारी कानून के रखवालों पर होती है। परंतु कानून के रखवालों की लापरवाही, भ्रष्टाचार या गलती का खामियाजा कई बार निर्दोषों को भुगतना पड़ जाता है। एक ऐसा ही मामला अमेरिका से सामने आया है।
डॉन्टे शार्प को यह पता ही नहीं था कि उसने किसी का कत्ल किया है लेकिन उसे कत्ल के जुर्म में पुलिस ने गिरफ्तार किया और साल भर बाद अदालत ने उसे दोषी ठहरा कर जिंदगीभर के लिए सलाखों के पीछे भी ढकेल दिया। २४ साल बाद वक्त ने करवट बदली और बेवजह जेल की कालकोठरी में केद डॉन्टे आज रिहा हो चुका है लेकिन वह आज भी यही जानने का प्रयास कर रहा है कि उसका गुनाह क्या था? उसे किस दुश्मनी की सजा दी गई थी? उसने बेगुनाह होने के बाद भी जो वक्त सलाखों के पीछे गुजारा है उसका हिसाब कौन देगा?
डॉन्टे शार्प का मामला करीब २४ साल पुराना है। बात १९९४ की है। उस दौरान डॉन्टे एक कुख्यात ड्रग डीलर हुआ करता था। पुलिस उसे गिरफ्तार करने की तैयारी कर ही रही थी, उसी दौरान एक शख्स की हत्या हो गई, मृतक की पहचान रैडक्लिफ के रूप में सामने आई। पुलिस ने रैडक्लिफ की हत्या के मामले की छानबीन की और डॉन्टे को हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया। पुलिस ने एक महिला चश्मदीद की गवाही के आधार पर डॉन्टे को गिरफ्तार किया था। प्रत्यक्षदर्शी महिला ने पुलिस को बताया कि उसने डॉन्टे व उसके एक साथी को रेडक्लिफ की हत्या करते हुए अपनी आंखों से देखा था। हालांकि डॉन्टे गुहार लगाता रहा कि वह बेगुनाह है और उसने किसी का खून नहीं किया है लेकिन पुलिस और अदालत ने उसकी गुहार को अनसुना कर दिया। वर्ष १९९५ में अदालत ने डॉन्टे को महिला गवाह की गवाही के आधार पर दोषी करार देते हुए उम्रकेद की सजा सुना दी।
सजा सुनाए जाने के बाद डॉन्टे को जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया गया। हालांकि फिर भी उसने हार नहीं मानी, वह अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ता रहा। वह बार-बार कहता रहा मृतक रेडक्लिफ से उसका कोई संबंध नहीं था। वह रेडक्लिफ को जानता भी नहीं था फिर ऐसी कोई वजह भी नहीं थी जिसके कारण वह रेडक्लिफ की हत्या करता। इसके अलावा महिला गवाह ने डॉन्टे के जिस साथी का जिक्र किया था उसके बारे में भी पुलिस कोई जानकारी नहीं जुटा पाई। लगभग २४ साल लंबी चली कानूनी लड़ाई के बाद वर्ष २०१९ में जज ने माना कि उनकी गिरफ्तारी गलत भी हो सकती है। यहां से डॉन्टे को एक उम्मीद की किरण दिखाई दी। पिछले शुक्रवार को वह किरण, रोशनी तब बदल गई जब डॉन्टे को जेल से रिहा कर दिया गया। अब जहां पुलिस के समक्ष रेडक्लिफ के वास्तविक कातिल को ढूंढ़ने की चुनौती है, वहीं बेगुनाह डॉन्टे का उचित पुनर्वास भी अब कानून और सरकार की जिम्मेदारी बन गई है।





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