पालघर, जिले में अच्छी पैदावार के लिए अधिकांश किसान रासायनिक उर्वरक का प्रयोग करते हैं, परंतु कृषि विभाग जरूरत के मुताबिक उर्वरक उपलब्ध नहीं करा रहा है। इससे किसानों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। यूरिया के लिए जिले भर के किसानों में हाहाकार मचा हुआ है। बारिश के बाद फसल में यूरिया डालने के लिए किसान दर-दर भटक रहे हैं। किसानों का आरोप है कि उन्हें भले ही यूरिया न मिल पा रही हो लेकिन इन दिनों इसकी जमकर कालाबाजारी की जा रही है, जिससे आम किसानों की पहुंच से यूरिया दूर हो गई है। विभागीय अधिकारियों को इससे कोई सरोकार नहीं है और वह कुम्भकर्णी नींद में सोते दिख रहे हैं।
किसानों का मानना है कि दो-चार दिन के अंदर खाद नहीं मिलती है तो इसके बाद कोई मतलब नहीं रह जाएगा। इसके बाद फसल बर्बाद हो जाएगी। जिले के कई उर्वरक वितरकों के लाइसेंस कृषि विभाग द्वारा अप्रैल-मई में वितरण में अनियमितता के चलते निरस्त कर दिए गए थे। अभी तक उसकी जांच चल रही है।
जिले के पालघर, दहानू, तलासरी मोखाड़ा, जव्हार, विक्रमगढ़ जैसे तालुका के क्षेत्रों में लाखों की संख्या में आदिवासी किसान रहते हैं, जिनकी आय का मुख्य स्रोत धान की खेती है। ऐसे में उर्वरक की किल्लत से इनकी रोजी-रोटी पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं।
पालघर के तारापुर औद्योगिक क्षेत्र में सैक़ड़ों की संख्या में रासायनिक कंपनियां हैं, जिसमें जमकर कालाबाजारी कर यूरिया भेजने की खबरें सुर्खियों में आती रहती हैं। किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष संतोष पावड़े कहते हैं कि यह हास्यास्पद है। आदिवासी बाहुल्य जिले में यूरिया के लिए किसानों को मारा-मारा फिरना पड़ रहा है, वहीं रासायनिक कंपनियों में धड़ल्ले से यूरिया की कालाबाजारी की जा रही है। किसानों ने मांग की है कि जल्द किसानों के लिए उर्वरक की सप्लाई तय की जाए।





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