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सांगली लोकसभा सीट : त्रिकोणीय लड़ाई

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सांगली। महाराष्ट्र में कांग्रेस के वर्चस्व वाले सांगली लोकसभा सीट पर काका, दादा और पहलवान के बीच चुनावी अखाड़े में जोर आजमाइश हो रही है। उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस-एनसीपी (एसपी) से चर्चा के बिना दो बार के महाराष्ट्र केसरी पहलवान चंद्रहार पाटिल को मैदान में उतारकर कांग्रेस को लड़ाई से ही बाहर कर दिया। हालांकि, कांग्रेस के दिग्गज नेता व पूर्व मुख्यमंत्री बसंतदादा पाटिल के नाती विशाल (दादा) पाटिल ने निर्दलीय मैदान में उतकर इंडी गठबंधन को चौंका दिया है। इससे लड़ाई त्रिकोणीय हो गई है। विशाल एमवीए के वोटों में सेंध लगाएंगे, जिसका फायदा दो बार के सांसद और भाजपा प्रत्याशी संजय (काका) पाटिल को मिलने की उम्मीद है।
सांगली सीट 19 में से 16 बार कांग्रेस जीती है। 2014 में पहली बार भाजपा के काका ने वसंतदादा पाटिल के नाती प्रतीक पाटिल को हराया था। 2019 में यह सीट कांग्रेस के सहयोगी दल स्वाभिमानी शेतकरी (किसान) संगठन के खाते में गई थी, जिस पर बसंतदादा के घराने के विशाल पाटिल ने काका को कड़ी चुनौती दी थी। इस बार राजनीतिक समीकरण कुछ इस तरह बने हैं कि लड़ाई भाजपा बनाम एमवीए नहीं, बल्कि भाजपा बनाम निर्दलीय हो गई है।
स्थानीय गुटों का खेल
सांगली में तीन पाटिलों की लड़ाई है। भाजपा का अपना मजबूत संगठन है। आरएसएस की ताकत है। छह विधानसभाओं में से तीन पर भाजपा के विधायक हैं। चंद्रहार पाटिल कहते हैं कि सांगली अब कांग्रेस का गढ़ नहीं रहा। हालांकि, विशाल पाटिल कांग्रेस की विरासत के सहारे ही चुनाव लड़ रहे हैं। सांगली की हर तालुका, विधानसभाओं में तीन से पांच गुट हैं, जो स्थानीय राजनीति में दबदबा रखते हैं। इन गुटों के लोग किसी पार्टी नहीं, बल्कि स्थानीय राजनीति, सत्ता का गणित और अर्थनीति के तहत अपनी भूमिका बदलते हैं।