Home Crime जेलों में कैदियों के बीच गुट और गिरोहबाजी

जेलों में कैदियों के बीच गुट और गिरोहबाजी

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मुंबई, कैदियों को जेलों में रखने का मकसद होता है, उन्हें सुधारना, उन्हें उनकी गलती का एहसास दिलाना, उनके मन में पश्चातप का भाव जगाना। मगर व्यवहार में ऐसा हो रहा है क्या? लेकिन जेलों में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। जेलों में कैदियों के बीच गुट और गिरोहबाजी बढ़ रही है। जेलों में बढ़ती हिंसा इसका प्रमाण है। अब तक अपराधियों पर जेल में बैठकर क्राइम सिंडीकेट चलाने का आरोप लगता था लेकिन अब जेलों में ही मर्डर के मामले बढ़ने लगे हैं।
अन्नू त्रिपाठी व बंशी यादव की कहानी, जेल में कैदियों में गैंगवार या वर्चस्व की जंग, कोई नई बात नहीं है। वर्ष २०१८ के जुलाई महीने में कुख्यात मुन्ना बजरंगी को बागपत जेल में गोलियों से छलनी कर दिया गया था। लेकिन इससे काफी पहले बनारस की जेलों में कोतवाली क्षेत्र के चर्चित अपराधी अनुराग उर्फ अन्नू त्रिपाठी और बंशी यादव की हत्याएं हो चुकी हैं। अन्नू और बंशी की जेल में हत्या का मामला हाल ही में चित्रकूट जेल में हुई बाहुबली मुख्तार अंसारी के करीबी मेराज और मुकीम काला की हत्या जैसा ही था।
ग्रिल के बाहर से मारी गोली
गौरतलब हो कि पूर्वांचल की जेलों में बंदूकें सबसे पहले वाराणसी में गरजी थीं। बंशी यादव को जिला जेल के मुख्य गेट पर अन्नू त्रिपाठी ने गोली मार दी थी। मुन्ना बजरंगी के लिए रंगदारी वसूलनेवाले शूटर अन्नू त्रिपाठी और बाबू यादव ने १३ मार्च, २००४ को जिला जेल में पानदरीबा से पार्षद रहे बंशी यादव को गोली मार दी थी। बताया जाता है कि जिला कारागार में उस समय लोहे के ग्रिल वाला गेट हुआ करता था। तब अन्नू व बाबू ने बाहर से ग्रिल में हाथ डालकर बंशी यादव को गोली मार दी थी। पार्षद बंशी यादव की हत्या के करीब एक साल बाद ही २ मार्च, २००५ को अन्नू त्रिपाठी की वाराणसी के सेंट्रल जेल में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में बनारस के शातिर अपराधी संतोष गुप्ता उर्फ किट्टू का नाम आया था। हैरानी की बात ये है कि किट्टू ने अपराध का ककहरा अन्नू से सीखा था। जेल में साथ रहने के दौरान अन्नू त्रिपाठी का पैर दबाने वाले किट्टू ने शह पाकर उसी की हत्या कर दी थी। बाद में किट्टू को पुलिस ने मुठभेड़ में मार गिराया था।