मुंबई : राज्य सरकार की सेवा में समाहित करने की मांग को लेकर हड़ताल पर गए एसटी कर्मचारियों को झटका लगा है। एसटी कर्मचारियों के मुद्दे का हल करने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित तीन सदस्सीय समिति ने एसटी कर्मचारियों को राज्य सरकार की सेवा में शामिल किए जाने से स्पष्ट रुप से इनकार कर दिया है। शुक्रवार को परिवहन मंत्री अनिल परब ने समिति की दोनों रिपोर्ट विधानमंडल के दोनों सदनों के पटल पर रखा।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि सड़क परिवहन कानून 1950 के अनुसार, एसटी कर्मचारियों को राज्य सरकार की सेवा में शामिल करना कानूनी रुप से संभव नहीं है। एसटी महामंडल का राज्य सरकार में पूरी तरह से विलीन कर सभी कर्मचारियों को सरकारी कर्मचारी समझने और महामंडल के यात्री परिवहन का व्यवसाय सरकार के विभाग की तरफ से किए जाने की मांग भी कानूनी प्रावधानों के अनुसार विचार करने योग्य नहीं है।
मूल वेतन बढ़ाने की शिफारिश
समिति ने एसटी में 10 वर्ष सेवा पूरा करने वाले कर्मचारियों के मूल वेतन में 5000 रुपए, 20 वर्ष तक सेवा करने वालों के मूल वेतन में 4000 रुपए और 20 वर्ष से अधिक सेवा देने वाले कर्मचारियों के मूल वेतन में 2500 रुपए वृद्धि की शिफारिश की है।
एसटी महामंडल कर्मचरियों की तीन प्रमुख मांग
परिवहन मंत्री की अध्यक्षता में गठित कृति समिति के समक्ष राज्य सरकार के कर्मचारियों की तरह महंगाई भत्ता 12 प्रतिशत से बढ़ा कर 28 फीसदी करने, शहरों के वर्गीकरण के अनुसार हाउसिंग एलाउंस को क्रमश: 8,16 और 24 प्रतिशत देने वेतन वृद्धि 2 प्रतिशत से बढ़ा कर 3 प्रतिशत करने की प्रमुख मांग रखी थी। इन मांगों को पहले ही मंजूर किया जा चुका है। इससे एसटी महामंडल पर प्रति माह 360 करोड़ रुपए का भार पहले ही बढ़ चुका है। महामंडल की वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए कर्मचारियों को समय पर वेतन देने के लिए लगातार चार वर्ष बजट में निधि उपलब्ध कराने की शिफारिश की है।





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