मुंबई, सीबीआई और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) जैसी केंद्रीय एजेंसियों को जमानत मिलने के बाद भी आरोपियों को लुकआउट नोटिस जारी करने के लिए कल मुंबई हाईकोर्ट ने जमकर फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि जमानत मिलने के बाद आरोपी न्यायालय की हिरासत में रहता है। फिर आप उसे लुकआउट नोटिस वैâसे जारी कर सकते हैं? कोर्ट ने कहा कि सीबीआई, ईडी खुद को संसद से बड़ा समझती हैं क्या? इतना ही नहीं, आप कोर्ट के आदेश को ताक पर रखकर संसद की अवमानना कर रहे हैं। ऐसे शब्दों में कोर्ट ने जांच एजेंसियों की क्लास भी लगाई।
यस बैंक घोटाले की जांच सीबीआई, ईडी की तरफ से जारी है। सीबीआई के अनुरोध पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यस बैंक के प्रबंधक निदेशक राणा कपूर की बेटी रोशनी के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया है। यस बैंक के मामले में सीबीआई ने रोशनी कपूर को आरोपी बनाया है। लुकआउट नोटिस को लेकर रोशनी ने सीबीआई के खिलाफ मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका पर न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति मिलिंद जाधव की खंडपीठ के समक्ष कल याचिका पर सुनवाई हुई। खंडपीठ ने इस याचिका पर गंभीरता से संज्ञान में लेते हुए केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया। न्यायमूर्ति ने कहा कि लुकआउट नोटिस सिर्फ फरार आरोपियों के लिए होता है। यदि कोई आरोपी एक बार गिरफ्तार हो जाए उसके बाद लुकआउट नोटिस का कोई मतलब नहीं रह जाता है।
मुंबई हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता हितेन वेणेगांवकर ने केंद्र सरकार का पक्ष रखा। खंडपीठ के समक्ष उन्होंने तर्क दिया कि अगर कोई आरोपी जमानत पर छूट जाता है, तब भी लुकआउट नोटिस को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। आरोपी जमानत पर छूटने के बाद विदेश भाग जाता है और उसका पता लगाना मुश्किल हो जाता है। हालांकि उनके इस तर्क पर न्यायमूर्ति ने असहमति जताई और कहा कि आवेदनकर्ता को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिल जाने पर लुकआउट नोटिस जारी करने का सवाल ही नहीं उठता है। ऐसा सवाल कोर्ट ने केंद्र सरकार के अधिवक्ता से किया। हालांकि न्यायमूर्ति के सवालों पर इसका कोई जवाब नहीं दिया गया। इसके बाद खंडपीठ ने सुनवाई २० सितंबर तक के लिए स्थगित कर केंद्रीय एजेंसियों को लुकआउट नोटिस के प्रावधानों के संबंध में नियम पेश करने का आदेश दिया है।
किसी आरोपी को कानून का उल्लंघन करके देश से भागने से रोकने के लिए लुकआउट नोटिस जारी किया जाता है, लेकिन जमानत मिलने के बाद किसी को एलओसी जारी करने का क्या उद्देश्य है? केंद्रीय एजेंसियां कानून से ऊपर नहीं हो सकतीं और न ही महासत्ता हो सकती हैं। यदि आवेदक विदेश जाना चाहता है तो उसे विशेष अदालत से अनुमति लेने दो, आप वहां विरोध करो। हमें क्यों परेशान कर रहे हो? और हमारा समय क्यों बर्बाद कर रहे हो?





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