मुंबई, अस्पतालों के आईसीयू में भर्ती गंभीर संक्रमण के शिकार कई मरीजों पर रिजर्व एंटीबायोटिक्स भी नाकाम साबित हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में करीब ७० फीसदी मरीजों के बेमौत मारे जाने का खतरा है, वहीं सबसे असरदार एंटीबायोटिक्स दवाएं भी केवल २० फीसदी मरीजों पर ही काम कर रही हैं।
उल्लेखनीय है कि देश के तमाम अस्पतालों के साथ मिलकर एम्स ने एक नेटवर्क तैयार किया है। उनकी मदद से एम्स द्वारा किए गए नए अध्ययन में पाया गया है कि एंटीबायोटिक दवाओं के बेअसर होने से स्थिति यह हो गई है कि डब्ल्यूएचओ द्वारा चुनिंदा मौकों पर इस्तेमाल की जानेवाली और रिजर्व वैâटेगरी में रखी गर्इं सबसे नई दवाएं भी अब कई बार काम नहीं कर रही हैं। इसकी वजह धड़ल्ले से मरीजों और डॉक्टरों का मनमर्जी से एंटीबायोटिक्स का इस्तेमाल करना है। दिल्ली के एम्स ट्रॉमा सेंटर की इन्फेक्शन कंट्रोल पॉलिसी को पूरे देश में लागू करने के लिए डॉ. पूर्वा माथुर की निगरानी में सभी अस्पतालों को जोड़ा जा रहा है। एम्स की तरफ से कहा गया है कि दक्षिणी राज्यों में उत्तर हिंदुस्थान के मुकाबले संक्रमण कम पाया जा रहा है। इसी तरह निजी अस्पतालों का संक्रमण नियंत्रण सरकारी अस्पतालों के मुकाबले काफी बेहतर है।





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